विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय [२५]
धृतराष्ट्रने कहा—मैं तुम्हारे धर्मयुक्त तथा कल्याण करनेवाले सुन्दर वचन सुनना चाहता हूँ, क्योंकि इस राजर्षिवंशमें केवल तुम्हीं विद्वानोंके भी माननीय हो ॥ १५ ॥
विदुर उवाच
राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्याधिपो भवेत् ।
प्रेष्यस्ते प्रेषितश्चैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिरः ॥ १६ ॥
विदुरजी बोले—महाराज धृतराष्ट्र ! श्रेष्ठ लक्षणोंसे सम्पन्न राजा युधिष्ठिर तीनों लोकोंके स्वामी हो सकते हैं। वे आपके आज्ञाकारी थे, पर आपने उन्हें वनमें भेज दिया ॥ १६ ॥
विपरीततरश्च त्वं भागधेये न सम्मतः ।
अर्चिषां प्रक्षयाच्चैव धर्मात्मा धर्मकोविदः ॥ १७ ॥
आप धर्मात्मा और धर्मके जानकार होते हुए भी आँखोंसे अन्धे होनेके कारण उन्हें पहचान न सके, इसीसे उनके अत्यन्त विपरीत हो गये और उन्हें राज्यका भाग देनेमें आपकी सम्मति नहीं हुई ॥ १७ ॥
अनृशंस्यादनुक्रोशाद् धर्मात् सत्यात् पराक्रमात् ।
गुरुत्वात्त्वयि सम्प्रेक्ष्य बहून् क्लेशांस्तितिक्षते ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरमें क्रूरताका अभाव, दया, धर्म, सत्य तथा पराक्रम हैं; वे आपमें पूज्यबुद्धि रखते हैं। इन्हीं सद्गुणोंके कारण वे सोच-विचारकर चुपचाप बहुत-से क्लेश सह रहे हैं ॥ १८ ॥
दुर्योधने सौबले च कर्णे दुःशासने तथा ।
एतेष्वैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि ॥ १९ ॥