विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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विदुरनीतिः
यतः प्राप्तः सञ्जयः पाण्डवेभ्यो न मे यथावन्मनसः प्रशान्तिः। सर्वेन्द्रियाण्यप्रकृतिं गतानि किं वक्ष्यतीत्येव मेऽद्य प्रचिन्ता ॥ १२ ॥
संजय जबसे पाण्डवोंके यहाँसे लौटकर आया है, तबसे मेरे मनको पूर्ण शान्ति नहीं मिलती। सभी इन्द्रियाँ विकल हो रही हैं। कल वह क्या कहेगा, इसी बातकी मुझे इस समय बड़ी भारी चिन्ता हो रही है ॥ १२ ॥
विदुर उवाच
अभियुक्तं बलवता दुर्बलं हीनसाधनम्। हृतस्वं कामिनं चोरमाविशन्ति प्रजागराः ॥ १३ ॥
विदुरजी बोले—जिसका बलवान्के साथ विरोध हो गया है उस साधनहीन दुर्बल मनुष्यको, जिसका सब कुछ हर लिया गया है उसको, कामीको तथा चोरको रातमें जागनेका रोग लग जाता है ॥ १३ ॥
कच्चिदेतैर्महादोषैर्न स्पृष्टोऽसि नराधिप। कच्चिच्च परवित्तेषु गृध्यन्न परितप्यसे ॥ १४ ॥
नरेन्द्र! कहीं आपका भी इन महान् दोषोंसे सम्पर्क तो नहीं हो गया है? कहीं पराये धनके लोभसे तो आप कष्ट नहीं पा रहे हैं? ॥ १४ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
श्रोतुमिच्छामि ते धर्म्यं परं नैःश्रेयसं वचः। अस्मिन् राजर्षिवंशे हि त्वमेकः प्राज्ञसम्मतः ॥ १५ ॥