विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished172 पृष्ठ
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| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ६६–६८ | प्रज्ञाकी प्रशंसा, भावी सुखके लिये पहलेसे ही सत्कर्म करनेकी प्रेरणा ... ... ... | ९० |
| ६९–७१ | किसकी कब प्रशंसा की जाती है, अधर्मद्वारा प्राप्त हुए धनसे दोष नहीं छिपता तथा कौन किसका शासक है, इन बातोंका विवेचन ... ... | ९१ |
| ७२–७४ | किन-किनका मूल नहीं जाना जा सकता, कौन दीर्घ कालतक पृथ्वीका पालन करता है और कौन मनुष्य पृथ्वीसे सुवर्णरूपी पुष्पका चयन करते हैं ... | ९१-९२ |
| ७५ | तीन प्रकारके कार्य ... ... | ९२ |
| ७६-७७ | दुर्योधन आदिपर राज्यका भार रखनेसे उन्नतिकी सम्भावना नहीं, पाण्डवोंके साथ पुत्रवत् व्यवहार कीजिये—यह विदुरजीकी धृतराष्ट्रको सलाह ... | ९२ |
चौथा अध्याय
| १–३ | दत्तात्रेय और साध्योंका संवाद—साध्योंका हंसरूपसे विचरनेवाले दत्तात्रेयजीसे उपदेश देनेका अनुरोध | ९३-९४ |
| ४ | हंसरूपसे दत्तात्रेयजीका उपदेश—धृति, शम और सत्य-धर्मके अनुसरणकी आवश्यकता, प्रिय और अप्रियको आत्मवत् समझनेकी प्रेरणा ... ... | ९४ |
| ५–८ | क्षमाशीलका प्रभाव, दूसरोंको गाली देने और कटुवचन कहने आदिका निषेध, कटुवचन और कटुवादीकी निन्दा ... ... ..: | ९४-९५ |
| ९–११ | गाली और कटुवचनके सह लेनेसे पुण्यकी पुष्टि, जैसा सङ्ग वैसा रङ्ग तथा देवता किसके आगमनकी बाट जोहते हैं, इत्यादि बातोंका विवेचन ... | ९५-९६ |