विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished172 पृष्ठ
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| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १२-१५ | वाणीकी चार विशेषताएँ—जैसा साथ वैसा भाव, निवृत्तिसे मुक्ति और दुःखका अभाव तथा समताकी प्रशंसा ... ... ... | ९६-९७ |
| १६-२१ | उत्तम, मध्यम और अधम मनुष्योंकी पहचान तथा अधम पुरुषोंकी सेवाको त्यागनेकी आज्ञा ... | ९७-९९ |
| २२-२४ | धृतराष्ट्रका विदुरसे महाकुलीन पुरुषोंके लक्षण पूछना और विदुरके द्वारा उनके प्रश्नोंका उत्तर | ९९-१०० |
| २५-२८ | किन-किन कर्मोंसे उत्तम कुल भी अधम हो जाते हैं—इसका प्रतिपादन ... ... | १००-१०१ |
| २९-३१ | सदाचार ही कुलीनताका मूल है, सदाचारके नाशसे सब कुछ नष्ट हो जाता है ... | १०१ |
| ३२-३३ | राजकुल तथा राजसभामें किन लोगोंका होना अभीष्ट नहीं है ... ... | १०१-१०२ |
| ३४-३५ | अतिथि-सत्कारके लिये सर्वसुलभ वस्तुएँ तथा उनका सदुपयोग ... ... | १०२ |
| ३६-३८ | महाकुलीन पुरुषकी प्रशंसा, उत्तम मित्रके लक्षण | १०२-१०३ |
| ३९-४० | चञ्चलचित्त पुरुषके पास न तो मित्र ठहरते हैं और न उसे अर्थकी प्राप्ति होती है—इसका प्रतिपादन | १०३ |
| ४१-४५ | दुष्ट पुरुषोंके स्वभाव, कृतघ्नोंकी निन्दा, मित्रोंके सत्कारकी आवश्यकता तथा संताप और शोकसे हानि | १०४ |
| ४६-४७ | हर्ष और शोक त्याज्य हैं ... ... | १०५ |
| ४८ | इन्द्रियोंकी विषयपरायणतासे बुद्धिका ह्रास ... | १०५ |
| ४९-५० | धृतराष्ट्रके उद्वेगपूर्ण वचन और उद्वेगशून्य शान्तपदकी जिज्ञासा ... ... | १०६ |