विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished172 पृष्ठ
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( १३ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ५१-५४ | विदुरजीका धृतराष्ट्रको शान्ति और सुखके उपाय बताना ... ... ... | १०६-१०७ |
| ५५-५७ | आपसमें वैर-विरोध रखनेवाले लोगोंको सुख-शान्तिकी दुर्लभता ... ... | १०७-१०८ |
| ५८-६० | जाति-बन्धुओंसे सम्भावित भय, सामूहिक शक्तिकी प्रबलता, आपसकी फूटसे दुःख और एकतासे सुख | १०८-१०९ |
| ६१ | ब्राह्मणों, स्त्रियों, जाति-भाइयों और गोओंपर बल दिखानेसे पतन ... ... | १०९ |
| ६२-६५ | संघ-शक्तिकी प्रशंसा ... ... | १०९-११० |
| ६६-६७ | कौन-कौन अवध्य हैं और मनुष्यमें क्या गुण है | ११० |
| ६८-६९ | क्रोधको पीनेसे शान्ति, रोगीका सुखका अभाव | ११०-१११ |
| ७०-७४ | धृतराष्ट्रको उलाहना देते हुए विदुरका उनसे कौरव-पाण्डवमें मेल एवं सन्धि करानेका आग्रह | १११-११२ |
पाँचवाँ अध्याय
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-६ | यमराजके दूत किन्हें नरकमें ले जाते हैं ... | ११३-११४ |
| ७-८ | जो जैसा करे उसके साथ वैसे बर्तावकी नीति, कौन क्या नष्ट करता है ... | ११४-११५ |
| ९-११ | मनुष्य पूरे सौ वर्षोंतक क्यों नहीं जीवित रह पाता, धृतराष्ट्रका यह प्रश्न और विदुरके द्वारा इसका उत्तर ... ... | ११५-११६ |
| १२-१३ | ब्रह्महत्यारोंके समान पापी ... | ११६ |