विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished172 पृष्ठ
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| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १४-१६ | स्वर्गलोकके अधिकारी विद्वान्के गुण, अप्रिय किंतु हितकर वचन बोलनेवालेकी दुर्लभता तथा राजाका सच्चा सहायक ... ... | ११६-११७ |
| १७-१८ | आत्म-कल्याणके लिये सब कुछ त्यागने तथा धन एवं स्त्रीद्वारा भी आत्मरक्षा करनेका आदेश ... | ११७ |
| १९-२१ | जुएको वैरका कारण बताते हुए विदुरका धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंके प्रति किये जानेवाले दुर्व्यवहारके लिये उलाहना ... ... ... | ११७-११८ |
| २२-२३ | राजा भृत्योंका विश्वासपात्र कैसे बनता है, सेवकोंकी जीविका बन्द करनेसे हानि ... | ११८-११९ |
| २४-२७ | सुयोग्य सहायकोंकी आवश्यकता, स्वामीके कृपापात्र सेवकके गुण, त्यागनेयोग्य भृत्यके दुर्गुण तथा दूतके आठ गुण ... ... | ११९-१२० |
| २८-२९ | सावधान मनुष्य क्या-क्या न करे ... | १२०-१२१ |
| ३० | किनके साथ लेन-देनका व्यवहार न करे ... | १२१ |
| ३१-३२ | पुरुषको उद्दीप्त करनेवाले आठ गुण तथा राजसम्मानकी महत्ता ... ... | १२१-१२२ |
| ३३-३४ | स्नानसे दस और स्वल्पाहारसे छः लाभ ... | १२२ |
| ३५-३६ | किसको अपने घरमें न ठहरने दे और किन लोगोंसे कभी सहायताकी याचना न करे ... | १२२-१२३ |
| ३७ | सेवन करनेके अयोग्य छः प्रकारके मनुष्य ... | १२३ |
| ३८-३९ | धन और सहायक एक-दूसरेके आश्रित हैं, वानप्रस्थ-आश्रम कब ग्रहण करे ... | १२३-१२४ |