विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished172 पृष्ठ
पृष्ठ 17, कुल 172 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 17
( १५ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ४०-४१ | सम्पूर्ण सिद्धियोंका मूलमन्त्र क्या है, किसे अपनी जीविकाके नाशका भय नहीं होता ... | १२४ |
| ४२-४६ | पाण्डवोंके साथ होनेवाले युद्धका दुष्परिणाम बताकर उनके परस्पर मेलसे होनेवाले लाभका दिग्दर्शन कराना ... ... | १२४-१२६ |
| ४७ | पापासक्त मनुष्य दूसरोंके दुर्गुणपर ही दृष्टि रखते हैं | १२६ |
| ४८-५० | धर्माचरणसे अर्थसिद्धि, बुद्धिको पापसे दूर रखनेमें लाभ; धर्म, अर्थ और कामके समयानुसार सेवनका फल ... ... | १२६ |
| ५१ | राजलक्ष्मीका अधिकारी कौन है ... | १२७ |
| ५२-५५ | मनुष्योंके पाँच प्रकारके बल ... | १२७ |
| ५६-५७ | महान् शक्तिशालीसे वैर न करे, विद्वान् पुरुष किनपर भरोसा नहीं करते ... | १२७-१२८ |
| ५८-५९ | बुद्धिकी प्रबलता, किनका अनादर न करे ... | १२८ |
| ६०-६२ | कुटुम्बीजन काठमें छिपी हुई आगके समान हैं, उनके फूटनेसे सब कुछ भस्म हो सकता है—इसका प्रतिपादन ... ... | १२८-१२९ |
| ६३-६४ | कौरव और पाण्डवोंमें लता और वृक्षका तथा वन और सिंहका-सा सम्बन्ध है, अतः इन्हें मिलकर रहना चाहिये, यह धृतराष्ट्रको बताना ... | १२९ |
छठा अध्याय
| १ | माननीय वृद्ध पुरुषोंके आनेपर खड़े होने और प्रणाम करनेकी आवश्यकता ... | १३० |