विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished172 पृष्ठ
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( १६ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| २-३ | अतिथि-सत्कारका क्रम और अतिथिके सत्कार-ग्रहण न करनेपर गृहस्थ-जीवनकी व्यर्थता ... | १३०-१३१ |
| ४-५ | पैर न धोनेयोग्य अतिथि, न बेचनेयोग्य वस्तुएँ | १३१ |
| ६-७ | सच्चे संन्यासी तथा पुण्यात्मा वानप्रस्थीका लक्षण | १३१-१३२ |
| ८-९ | बुद्धिमान्की बड़ी बाँहें होती हैं, राजा कहीं भी अधिक विश्वास न करे ... ... | १३२ |
| १०-११ | मनुष्यको कैसा होना चाहिये, स्त्रियोंके विशेष संरक्षणकी आवश्यकता ... ... | १३२-१३३ |
| १२-१४ | किसको किसकी रक्षाका भार सौंपे, कौन किससे उत्पन्न हुआ है और कुलीन संत कैसे होते हैं—इसका विवेचन ... ... | १३३-१३४ |
| १५-२१ | कौन राजा दीर्घकालतक ऐश्वर्य भोगता है, अपनी मन्त्रणा दूसरोंपर कैसे प्रकट नहीं होती, गुप्त-मन्त्रणाके स्थान, मन्त्री न बनानेयोग्य व्यक्ति, मन्त्रीका उत्तरदायित्व तथा मन्त्रणाकी रक्षासे ही राजाको सिद्धिकी प्राप्ति ... | १३४-१३५ |
| २२-२४ | बुरे कर्मोंका दुष्परिणाम, उत्तम कर्मोंके अनुष्ठानसे लाभ तथा मन्त्रणा सुननेका अधिकारी ... | १३५ |
| २५-२६ | किस राजाके अधीन पृथ्वी होती है और किसे वह धन देती है ... ... | १३६ |
| २७ | राजा अकेले सब कुछ न हड़प ले ... | १३६ |
| २८-२९ | किसको कौन जानता है, वशमें आये हुए शत्रु का वध आवश्यक है ... | १३६-१३७ |
| ३०-३३ | कहाँ-कहाँ क्रोधको रोकना चाहिये, निरर्थक कलहके त्यागसे लाभ, कैसे राजाको प्रजा नहीं चाहती, विद्वान् पुरुषकी श्रेष्ठता ... | १३७ |