विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
( १३ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ५१-५४ | विदुरजीका धृतराष्ट्रको शान्ति और सुखके उपाय बताना ... ... ... | १०६-१०७ |
| ५५-५७ | आपसमें वैर-विरोध रखनेवाले लोगोंको सुख-शान्तिकी दुर्लभता ... ... | १०७-१०८ |
| ५८-६० | जाति-बन्धुओंसे सम्भावित भय, सामूहिक शक्तिकी प्रबलता, आपसकी फूटसे दुःख और एकतासे सुख | १०८-१०९ |
| ६१ | ब्राह्मणों, स्त्रियों, जाति-भाइयों और गोओंपर बल दिखानेसे पतन ... ... | १०९ |
| ६२-६५ | संघ-शक्तिकी प्रशंसा ... ... | १०९-११० |
| ६६-६७ | कौन-कौन अवध्य हैं और मनुष्यमें क्या गुण है | ११० |
| ६८-६९ | क्रोधको पीनेसे शान्ति, रोगीका सुखका अभाव | ११०-१११ |
| ७०-७४ | धृतराष्ट्रको उलाहना देते हुए विदुरका उनसे कौरव-पाण्डवमें मेल एवं सन्धि करानेका आग्रह | १११-११२ |
पाँचवाँ अध्याय
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १-६ | यमराजके दूत किन्हें नरकमें ले जाते हैं ... | ११३-११४ |
| ७-८ | जो जैसा करे उसके साथ वैसे बर्तावकी नीति, कौन क्या नष्ट करता है ... | ११४-११५ |
| ९-११ | मनुष्य पूरे सौ वर्षोंतक क्यों नहीं जीवित रह पाता, धृतराष्ट्रका यह प्रश्न और विदुरके द्वारा इसका उत्तर ... ... | ११५-११६ |
| १२-१३ | ब्रह्महत्यारोंके समान पापी ... | ११६ |
( १४ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १४-१६ | स्वर्गलोकके अधिकारी विद्वान्के गुण, अप्रिय किंतु हितकर वचन बोलनेवालेकी दुर्लभता तथा राजाका सच्चा सहायक ... ... | ११६-११७ |
| १७-१८ | आत्म-कल्याणके लिये सब कुछ त्यागने तथा धन एवं स्त्रीद्वारा भी आत्मरक्षा करनेका आदेश ... | ११७ |
| १९-२१ | जुएको वैरका कारण बताते हुए विदुरका धृतराष्ट्रसे पाण्डवोंके प्रति किये जानेवाले दुर्व्यवहारके लिये उलाहना ... ... ... | ११७-११८ |
| २२-२३ | राजा भृत्योंका विश्वासपात्र कैसे बनता है, सेवकोंकी जीविका बन्द करनेसे हानि ... | ११८-११९ |
| २४-२७ | सुयोग्य सहायकोंकी आवश्यकता, स्वामीके कृपापात्र सेवकके गुण, त्यागनेयोग्य भृत्यके दुर्गुण तथा दूतके आठ गुण ... ... | ११९-१२० |
| २८-२९ | सावधान मनुष्य क्या-क्या न करे ... | १२०-१२१ |
| ३० | किनके साथ लेन-देनका व्यवहार न करे ... | १२१ |
| ३१-३२ | पुरुषको उद्दीप्त करनेवाले आठ गुण तथा राजसम्मानकी महत्ता ... ... | १२१-१२२ |
| ३३-३४ | स्नानसे दस और स्वल्पाहारसे छः लाभ ... | १२२ |
| ३५-३६ | किसको अपने घरमें न ठहरने दे और किन लोगोंसे कभी सहायताकी याचना न करे ... | १२२-१२३ |
| ३७ | सेवन करनेके अयोग्य छः प्रकारके मनुष्य ... | १२३ |
| ३८-३९ | धन और सहायक एक-दूसरेके आश्रित हैं, वानप्रस्थ-आश्रम कब ग्रहण करे ... | १२३-१२४ |
( १५ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ४०-४१ | सम्पूर्ण सिद्धियोंका मूलमन्त्र क्या है, किसे अपनी जीविकाके नाशका भय नहीं होता ... | १२४ |
| ४२-४६ | पाण्डवोंके साथ होनेवाले युद्धका दुष्परिणाम बताकर उनके परस्पर मेलसे होनेवाले लाभका दिग्दर्शन कराना ... ... | १२४-१२६ |
| ४७ | पापासक्त मनुष्य दूसरोंके दुर्गुणपर ही दृष्टि रखते हैं | १२६ |
| ४८-५० | धर्माचरणसे अर्थसिद्धि, बुद्धिको पापसे दूर रखनेमें लाभ; धर्म, अर्थ और कामके समयानुसार सेवनका फल ... ... | १२६ |
| ५१ | राजलक्ष्मीका अधिकारी कौन है ... | १२७ |
| ५२-५५ | मनुष्योंके पाँच प्रकारके बल ... | १२७ |
| ५६-५७ | महान् शक्तिशालीसे वैर न करे, विद्वान् पुरुष किनपर भरोसा नहीं करते ... | १२७-१२८ |
| ५८-५९ | बुद्धिकी प्रबलता, किनका अनादर न करे ... | १२८ |
| ६०-६२ | कुटुम्बीजन काठमें छिपी हुई आगके समान हैं, उनके फूटनेसे सब कुछ भस्म हो सकता है—इसका प्रतिपादन ... ... | १२८-१२९ |
| ६३-६४ | कौरव और पाण्डवोंमें लता और वृक्षका तथा वन और सिंहका-सा सम्बन्ध है, अतः इन्हें मिलकर रहना चाहिये, यह धृतराष्ट्रको बताना ... | १२९ |
छठा अध्याय
| १ | माननीय वृद्ध पुरुषोंके आनेपर खड़े होने और प्रणाम करनेकी आवश्यकता ... | १३० |
( १६ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| २-३ | अतिथि-सत्कारका क्रम और अतिथिके सत्कार-ग्रहण न करनेपर गृहस्थ-जीवनकी व्यर्थता ... | १३०-१३१ |
| ४-५ | पैर न धोनेयोग्य अतिथि, न बेचनेयोग्य वस्तुएँ | १३१ |
| ६-७ | सच्चे संन्यासी तथा पुण्यात्मा वानप्रस्थीका लक्षण | १३१-१३२ |
| ८-९ | बुद्धिमान्की बड़ी बाँहें होती हैं, राजा कहीं भी अधिक विश्वास न करे ... ... | १३२ |
| १०-११ | मनुष्यको कैसा होना चाहिये, स्त्रियोंके विशेष संरक्षणकी आवश्यकता ... ... | १३२-१३३ |
| १२-१४ | किसको किसकी रक्षाका भार सौंपे, कौन किससे उत्पन्न हुआ है और कुलीन संत कैसे होते हैं—इसका विवेचन ... ... | १३३-१३४ |
| १५-२१ | कौन राजा दीर्घकालतक ऐश्वर्य भोगता है, अपनी मन्त्रणा दूसरोंपर कैसे प्रकट नहीं होती, गुप्त-मन्त्रणाके स्थान, मन्त्री न बनानेयोग्य व्यक्ति, मन्त्रीका उत्तरदायित्व तथा मन्त्रणाकी रक्षासे ही राजाको सिद्धिकी प्राप्ति ... | १३४-१३५ |
| २२-२४ | बुरे कर्मोंका दुष्परिणाम, उत्तम कर्मोंके अनुष्ठानसे लाभ तथा मन्त्रणा सुननेका अधिकारी ... | १३५ |
| २५-२६ | किस राजाके अधीन पृथ्वी होती है और किसे वह धन देती है ... ... | १३६ |
| २७ | राजा अकेले सब कुछ न हड़प ले ... | १३६ |
| २८-२९ | किसको कौन जानता है, वशमें आये हुए शत्रु का वध आवश्यक है ... | १३६-१३७ |
| ३०-३३ | कहाँ-कहाँ क्रोधको रोकना चाहिये, निरर्थक कलहके त्यागसे लाभ, कैसे राजाको प्रजा नहीं चाहती, विद्वान् पुरुषकी श्रेष्ठता ... | १३७ |
( १७ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ३३-३५ | मूर्ख और दुष्टके बर्ताव तथा उसपर विपत्तिकी सम्भावना | १३८ |
| ३६-३७ | सम्पूर्ण भूतोंको अपना बना लेनेवाले गुण, श्रेष्ठ राजाको बिना धनके भी सहायक मिलते हैं | १३८ |
| ३८-३९ | लक्ष्मीको बढ़ानेवाले सात गुण तथा त्याग देने-योग्य राजा | १३८-१३९ |
| ४०-४१ | निर्दोषको सतानेसे हानि, जिससे अपनी हानि हो उन्हें प्रसन्न रखनेकी आवश्यकता | १३९ |
| ४२-४३ | किनके हाथोंमें पड़े हुए पदार्थ संशयमें पड़ जाते हैं तथा कौन लोग विपत्तिके समुद्रमें डूबते हैं | १३९ |
| ४४-४५ | कौन पण्डित है, किस मनुष्यका जीवन खतरेमें होता है | १४० |
| ४६-४७ | पाण्डवोंको त्यागकर दुर्योधनको राज्य देना उसके पतनका कारण होगा—यह विदुरजीकी चेतावनी | १४० |
| सातवाँ अध्याय | ||
| १ | मनुष्य प्रारब्धके अधीन है—यह धृतराष्ट्रका कथन | १४१ |
| २-४ | विदुरका उपदेश—समयके विपरीत बोलनेसे अपमान, कौन प्रिय होता है, प्रिय और अप्रिय व्यक्तिके कार्योंमें दृष्टिभेद | १४१-१४२ |
| ५ | एक दुर्योधनके न त्यागनेसे सौ पुत्रोंके नाशकी सम्भावना | १४२ |
| ६-७ | क्षय और वृद्धिकी व्याख्या | १४२ |
| ८-९ | गुणहीन धनियोंके त्यागकी आशा, धृतराष्ट्रका पुत्रको त्यागनेमें अपनी असमर्थता बताना | १४३ |
( १८ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १०-१३ | गुणवान् और विनयशीलका स्वभाव, दुष्टोंसे लेन-देन करनेमें दोष तथा उनको साथ रखनेकी भी निन्दा | १४३-१४४ |
| १४-१६ | महान् दोषोंसे युक्त पुरुष त्याज्य हैं, नीच पुरुषोंका प्रेम नश्वर होता है, नीचका स्वभाव और नीच पुरुषोंको दूरसे ही त्याग देनेकी प्रेरणा ... | १४४-१४५ |
| १७-३२ | जाति-भाइयोंकी रक्षा और सत्कारका महत्त्व बताते हुए उनसे मिलकर रहने और पाण्डवोंको उनका न्यायोचित हक देनेके लिये धृतराष्ट्रसे विदुरजीका अनुरोध ... ... | १४५-१४८ |
| ३३-३५ | कौन दीर्घकालतक यशका भागी होता है, कौनसा ज्ञान व्यर्थ है, किसका अभ्युदय और किसका पतन होता है ... ... | १४८-१४९ |
| ३६-३८ | मन्त्रभेदके छः द्वार और उन्हें बन्द रखनेका महत्त्व | १४९ |
| ३९-४१ | शास्त्रज्ञान और वृद्धोंकी सेवाका महत्त्व, कौन वस्तु कहाँ नष्ट होती है और बुद्धिमान् पुरुष कैसी मैत्री करे ... ... | १५० |
| ४२-४३ | किस गुणसे किस अवगुणका नाश होता है और कुलकी परीक्षा कैसे की जाती है ... | १५०-१५१ |
| ४४-४७ | स्वतःप्राप्त भोगसामग्रीका विरोध न करे, कैसे सुहृद्की सर्वथा रक्षा करनी चाहिये, कौन सैकड़ों कुलीनोंसे बढ़कर हैं और किनकी मित्रता कभी नष्ट नहीं होती ... ... | १५१ |
| ४८-५० | खोटी बुद्धिवालेको त्यागनेकी आवश्यकता, किनके साथ मित्रता न करे और मित्र कैसा होना चाहिये | १५२ |
( १९ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ५१-५६ | इन्द्रियोंको सर्वथा रोकने अथवा बिलकुल खुली छोड़ देनेसे हानि, आयु बढ़ानेवाले सद्गुण, वीर पुरुषोंका व्रत क्या है, कौन मनुष्य कभी अर्थसे हीन नहीं होता तथा कल्याणकारी कार्य और उन्हें करनेकी आवश्यकता ... ... | १५२-१५३ |
| ५७-५९ | अनिर्वेदका महत्त्व तथा क्षमाकी महिमा ... | १५४ |
| ६०-६४ | किस सुखका यथेष्ट सेवन करे, किनके यहाँ लक्ष्मीका वास नहीं होता, दुष्ट पुरुषोंके बर्ताव, लक्ष्मी किसके पास भयके मारे नहीं जातीं तथा राजलक्ष्मीका स्वभाव कैसा होता है ... ... | १५४-१५५ |
| ६५-६८ | किसका क्या फल है, किस कर्मका फल परलोकमें नहीं मिलता, सत्त्वसम्पन्न पुरुषोंकी निर्भयता तथा उन्नतिके मूल हेतु ... ... | १५५-१५६ |
| ६९-७१ | किनका कौन-सा बल है, व्रतको नष्ट न करनेवाली आठ वस्तुएँ तथा संक्षेपसे धर्मका स्वरूप ... | १५६-१५७ |
| ७२-७६ | किससे किसको जीते, किनपर विश्वास न करे, नित्य गुरुजनोंको प्रणाम करनेसे लाभ, कैसे धनकी ओर मन न लगावे और कौन-कौन शोचनीय हैं | १५७ |
| ७७-८१ | किसके लिये क्या बुढ़ापा है, किसका क्या मल है और किससे किसको जीतनेकी चेष्टा न करे ... | १५८ |
| ८२-८५ | किसका जीवन सफल है, लोभ या इच्छाका परित्याग करे, पृथ्वीके सम्पूर्ण भोग एक पुरुषके लिये पर्याप्त नहीं हैं, धृतराष्ट्रसे अपने पुत्रों और पाण्डवोंपर समान बर्ताव करनेका अनुरोध ... ... | १५९ |
( २० )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| आठवाँ अध्याय | ||
| १–३ | किसको शीघ्र सुयश एवं सुखकी प्राप्ति होती है, कौन दुःखोंसे मुक्त हो सुखपूर्वक सोता है और ब्रह्महत्याके समान तीन कुकर्म ... | १६० |
| ४ | मृत्यु क्या है, लक्ष्मीका वध कैसे होता है और विद्याके तीन शत्रु कौन हैं ... | १६०-१६१ |
| ५–६ | विद्यार्थियोंके सात दोष, सुखार्थी या विद्यार्थी ... | १६१ |
| ७–११ | किसकी किससे तृप्ति नहीं होती, कौन किसको नष्ट कर देता है और घरमें रखनेयोग्य वस्तुएँ ... | १६१-१६२ |
| १२–१३ | जीवनके लिये भी धर्मका त्याग न करे तथा धर्म और संतोषकी महत्ता ... | १६२-१६३ |
| १४–१८ | एक दिन सभी मृत्युके अधीन होते हैं, संसारके सगे-सम्बन्धी मृतकका साथ नहीं देते, कर्म ही उसके साथ जाता है, अतः धर्मसंग्रहकी आवश्यकता ... | १६३-१६४ |
| १९–२२ | अज्ञानसे छूटने और जन्म-मृत्युरूप भयसे बचनेका उपाय ... | १६४-१६५ |
| २३–२५ | कौन कभी मोहमें नहीं पड़ता, किससे किसकी रक्षा करे तथा कौन ब्राह्मण ब्रह्मलोकसे भ्रष्ट नहीं होता ... | १६६ |
| २६–२८ | कौन क्षत्रिय ऊर्ध्वलोकमें जाता है, कौन वैश्य स्वर्गमें दिव्य सुख भोगता है तथा कौन शूद्र स्वर्ग-सुखका अनुभव करता है ... | १६६-१६७ |
| २९–३२ | युधिष्ठिरको क्षात्रधर्ममें प्रतिष्ठित करनेके लिये धृतराष्ट्रसे विदुरका अनुरोध, विदुरकी बातें स्वीकार करते हुए भी धृतराष्ट्रका दुर्योधनके सामने अपनी विवशता बताना और प्रारब्धको प्रबल एवं पुरुषार्थको निरर्थक मानना ... | १६७-१६८ |
पहला अध्याय (महाभारत ३३वाँ अध्याय - पण्डित व मूर्ख लक्षण)
॥ श्रीहरिः ॥
विदुरनीति
हिन्दी-अनुवादसहित
पहला अध्याय
वैशम्पायन उवाच
द्वाःस्थं प्राह महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
विदुरं द्रष्टुमिच्छामि तमिहानय माचिरम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—[ संजयके चले जानेपर ] महाबुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने द्वारपालसे कहा—'मैं विदुरसे मिलना चाहता हूँ । उन्हें यहाँ शीघ्र बुला लाओ' ॥ १ ॥
प्रहितो धृतराष्ट्रेण दूतः क्षत्तारमब्रवीत् ।
ईश्वरस्त्वां महाराजो महाप्राज्ञ दिदृक्षति ॥ २ ॥
धृतराष्ट्रका भेजा हुआ वह दूत जाकर विदुरसे बोला— 'महामते ! हमारे स्वामी महाराज धृतराष्ट्र आपसे मिलना चाहते हैं' ॥ २ ॥
एवमुक्तस्तु विदुरः प्राप्य राजनिवेशनम् ।
अब्रवीद् धृतराष्ट्राय द्वाःस्थः मां प्रतिवेदय ॥ ३ ॥
२२ विदुरनीति
उसके ऐसा कहनेपर विदुरजी राजमहलके पास जाकर बोले—'द्वारपाल ! धृतराष्ट्रको मेरे आनेकी सूचना दे दो' ॥ ३ ॥
द्वाःस्थ उवाच
विदुरोऽयमनुप्राप्तो राजेन्द्र तव शासनात् ।
द्रष्टुमिच्छति ते पादौ किं करोतु प्रशाधि माम् ॥ ४ ॥
द्वारपालने जाकर कहा—'महाराज ! आपकी आज्ञासे विदुरजी यहाँ आ पहुँचे हैं, वे आपके चरणोंका दर्शन करना चाहते हैं । मुझे आज्ञा दीजिये, उन्हें क्या कार्य बताया जाय' ॥ ४ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
प्रवेशय महाप्रज्ञं विदुरं दीर्घदर्शिनम् ।
अहं हि विदुरस्यास्य नाकल्पो जातु दर्शने ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—'महाबुद्धिमान् दूरदर्शी विदुरको भीतर ले आओ, मुझे इस विदुरसे मिलनेमें कभी भी अड़चन नहीं है' ॥ ५ ॥
द्वाःस्थ उवाच
प्रविशान्तःपुरं क्षत्तर्महाराजस्य धीमतः ।
न हि ते दर्शनेऽकल्पो जातु राजाब्रवीद्धि माम् ॥ ६ ॥
द्वारपाल विदुरके पास आकर बोला—'विदुरजी ! आप बुद्धिमान् महाराज धृतराष्ट्रके अन्तःपुरमें प्रवेश कीजिये। महाराजने मुझसे कहा है कि मुझे विदुरसे मिलनेमें कभी अड़चन नहीं है' ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रविश्य विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम् ।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं चिन्तयानं नराधिपम् ॥ ७ ॥
पहला अध्याय २३
वैशम्पायनजी कहते हैं—तदनन्तर विदुर धृतराष्ट्रके महलके भीतर जाकर चिन्तामें पड़े हुए राजासे हाथ जोड़कर बोले—॥ ७ ॥
विदुरोऽहं महाप्राज्ञ सम्प्राप्तस्तव शासनात्।
यदि किञ्चन कर्तव्यमय्यमस्मि प्रशाधि माम् ॥ ८ ॥
'महाप्राज्ञ ! मैं विदुर हूँ, आपकी आज्ञासे यहाँ आया हूँ। यदि मेरे करनेयोग्य कुछ काम हो तो मैं उपस्थित हूँ, मुझे आज्ञा कीजिये' ॥ ८ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
सञ्जयो विदुर प्राज्ञो गर्हयित्वा च मां गतः।
अजातशत्रोः श्वो वाक्यं सभामध्ये स वक्ष्यति ॥ ९ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—विदुर ! संजय आया था, मुझे बुरा-भला कहकर चला गया है। कल सभामें वह अजातशत्रु युधिष्ठिरके वचन सुनावेगा ॥ ९ ॥
तस्याद्य कुरुवीरस्य न विज्ञातं वचो मया।
तन्मे दहति गात्राणि तदकार्षीत् प्रजागरम् ॥ १० ॥
आज मैं उस कुरुवीर युधिष्ठिरकी बात न जान सका—यही मेरे अङ्गोंको जला रहा है और इसीने मुझे अबतक जगा रखा है ॥ १० ॥
जाग्रतो दह्यमानस्य श्रेयो यदनुपश्यसि।
तद् ब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलो ह्यसि ॥ ११ ॥
तात ! मैं चिन्तासे जलता हुआ अभीतक जग रहा हूँ। मेरे लिये जो कल्याणकी बात समझो, वह कहो; क्योंकि हम-लोगोंमें तुम्हीं धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण हो ॥ ११ ॥
२४
विदुरनीतिः
यतः प्राप्तः सञ्जयः पाण्डवेभ्यो न मे यथावन्मनसः प्रशान्तिः। सर्वेन्द्रियाण्यप्रकृतिं गतानि किं वक्ष्यतीत्येव मेऽद्य प्रचिन्ता ॥ १२ ॥
संजय जबसे पाण्डवोंके यहाँसे लौटकर आया है, तबसे मेरे मनको पूर्ण शान्ति नहीं मिलती। सभी इन्द्रियाँ विकल हो रही हैं। कल वह क्या कहेगा, इसी बातकी मुझे इस समय बड़ी भारी चिन्ता हो रही है ॥ १२ ॥
विदुर उवाच
अभियुक्तं बलवता दुर्बलं हीनसाधनम्। हृतस्वं कामिनं चोरमाविशन्ति प्रजागराः ॥ १३ ॥
विदुरजी बोले—जिसका बलवान्के साथ विरोध हो गया है उस साधनहीन दुर्बल मनुष्यको, जिसका सब कुछ हर लिया गया है उसको, कामीको तथा चोरको रातमें जागनेका रोग लग जाता है ॥ १३ ॥
कच्चिदेतैर्महादोषैर्न स्पृष्टोऽसि नराधिप। कच्चिच्च परवित्तेषु गृध्यन्न परितप्यसे ॥ १४ ॥
नरेन्द्र! कहीं आपका भी इन महान् दोषोंसे सम्पर्क तो नहीं हो गया है? कहीं पराये धनके लोभसे तो आप कष्ट नहीं पा रहे हैं? ॥ १४ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
श्रोतुमिच्छामि ते धर्म्यं परं नैःश्रेयसं वचः। अस्मिन् राजर्षिवंशे हि त्वमेकः प्राज्ञसम्मतः ॥ १५ ॥
पहला अध्याय [२५]
धृतराष्ट्रने कहा—मैं तुम्हारे धर्मयुक्त तथा कल्याण करनेवाले सुन्दर वचन सुनना चाहता हूँ, क्योंकि इस राजर्षिवंशमें केवल तुम्हीं विद्वानोंके भी माननीय हो ॥ १५ ॥
विदुर उवाच
राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्याधिपो भवेत् ।
प्रेष्यस्ते प्रेषितश्चैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिरः ॥ १६ ॥
विदुरजी बोले—महाराज धृतराष्ट्र ! श्रेष्ठ लक्षणोंसे सम्पन्न राजा युधिष्ठिर तीनों लोकोंके स्वामी हो सकते हैं। वे आपके आज्ञाकारी थे, पर आपने उन्हें वनमें भेज दिया ॥ १६ ॥
विपरीततरश्च त्वं भागधेये न सम्मतः ।
अर्चिषां प्रक्षयाच्चैव धर्मात्मा धर्मकोविदः ॥ १७ ॥
आप धर्मात्मा और धर्मके जानकार होते हुए भी आँखोंसे अन्धे होनेके कारण उन्हें पहचान न सके, इसीसे उनके अत्यन्त विपरीत हो गये और उन्हें राज्यका भाग देनेमें आपकी सम्मति नहीं हुई ॥ १७ ॥
अनृशंस्यादनुक्रोशाद् धर्मात् सत्यात् पराक्रमात् ।
गुरुत्वात्त्वयि सम्प्रेक्ष्य बहून् क्लेशांस्तितिक्षते ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरमें क्रूरताका अभाव, दया, धर्म, सत्य तथा पराक्रम हैं; वे आपमें पूज्यबुद्धि रखते हैं। इन्हीं सद्गुणोंके कारण वे सोच-विचारकर चुपचाप बहुत-से क्लेश सह रहे हैं ॥ १८ ॥
दुर्योधने सौबले च कर्णे दुःशासने तथा ।
एतेष्वैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि ॥ १९ ॥
२६
विदुरनीति
आप दुर्योधन, शकुनि, कर्ण तथा दुःशासन-जैसे अयोग्य व्यक्तियोंपर राज्यका भार रखकर कैसे ऐश्वर्य-वृद्धि चाहते हैं ?॥१९॥
आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता ।
यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥ २० ॥
अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान, उद्योग, दुःख सहनेकी शक्ति और धर्ममें स्थिरता—ये गुण जिस मनुष्यको पुरुषार्थसे च्युत नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है ॥ २० ॥
निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते ।
अनास्तिकः श्रद्दधान एतत् पण्डितलक्षणम् ॥ २१ ॥
जो अच्छे कर्मोंका सेवन करता और बुरे कर्मोंसे दूर रहता है, साथ ही जो आस्तिक और श्रद्धालु है, उसके वे सद्गुण पण्डित होनेके लक्षण हैं ॥ २१ ॥
क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता ।
यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥ २२ ॥
क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दण्डता तथा अपनेको पूज्य समझना—ये भाव जिसको पुरुषार्थसे भ्रष्ट नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है ॥ २२ ॥
यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे ।
कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥ २३ ॥
दूसरे लोग जिसके कर्तव्य, सलाह और पहलेसे किये हुए विचारको नहीं जानते, बल्कि काम पूरा होनेपर ही जानते हैं, वही पण्डित कहलाता है ॥ २३ ॥
पहला अध्याय २७
यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः ।
समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते ॥ २४ ॥
सर्दी-गर्मी, भय-अनुराग, सम्पत्ति अथवा दरिद्रता—ये जिसके कार्यमें विघ्न नहीं डालते वही पण्डित कहलाता है ॥ २४ ॥
यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्तते ।
कामादर्थं वृणीते यः स वै पण्डित उच्यते ॥ २५ ॥
जिसकी लौकिक बुद्धि धर्म और अर्थका ही अनुसरण करती है और जो भोगको छोड़कर पुरुषार्थका ही वरण करता है, वही पण्डित कहलाता है ॥ २५ ॥
यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते ।
न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः ॥ २६ ॥
विवेकपूर्ण बुद्धिवाले पुरुष शक्तिके अनुसार काम करनेकी इच्छा रखते हैं और करते भी हैं तथा किसी वस्तुको तुच्छ समझकर उसकी अवहेलना नहीं करते ॥ २६ ॥
क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति
विज्ञाय चार्थं भजते न कामात् ।
नासम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे
तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य ॥ २७ ॥
विद्वान् पुरुष किसी विषयको देरतक सुनता है किंतु शीघ्र ही समझ लेता है, समझकर कर्तव्यबुद्धिसे पुरुषार्थमें प्रवृत्त होता है—कामनासे नहीं; बिना पूछे दूसरेके विषयमें व्यर्थ कोई बात नहीं कहता है। उसका यह स्वभाव पण्डितकी मुख्य पहचान है ॥ २७ ॥
२८ विदुरनीति
नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम् ।
आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः ॥ २८ ॥
पण्डितोंकी-सी बुद्धि रखनेवाले मनुष्य दुर्लभ वस्तुकी कामना नहीं करते, खोयी हुई वस्तुके विषयमें शोक करना नहीं चाहते और विपत्तिमें पड़कर घबराते नहीं हैं ॥ २८ ॥
निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः ।
अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते ॥ २९ ॥
जो पहले निश्चय करके फिर कार्यका आरम्भ करता है, कार्यके बीचमें नहीं रुकता, समयको व्यर्थ नहीं जाने देता और चित्तको वशमें रखता है, वही पण्डित कहलाता है ॥ २९ ॥
आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते ।
हितं च नाभ्यसूयन्ति पण्डिता भरतर्षभ ॥ ३० ॥
भरतकुल-भूषण ! पण्डितजन श्रेष्ठ कर्मोंमें रुचि रखते हैं, उन्नतिके कार्य करते हैं तथा भलाई करनेवालोंमें दोष नहीं निकालते हैं ॥ ३० ॥
न हृष्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते ।
गाङ्गो ह्रद इवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ॥ ३१ ॥
जो अपना आदर होनेपर हर्षके मारे फूल नहीं उठता, अनादरसे संतप्त नहीं होता तथा गङ्गाजीके कुण्डके समान जिसके चित्तको क्षोभ नहीं होता, वह पण्डित कहलाता है ॥ ३१ ॥
तत्त्वज्ञः सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम् ।
उपायज्ञो मनुष्याणां नरः पण्डित उच्यते ॥ ३२ ॥
पहला अध्याय २९
जो सम्पूर्ण भौतिक पदार्थोंकी असलियतका ज्ञान रखनेवाला, सब कार्योंके करनेका ढंग जाननेवाला तथा मनुष्योंमें सबसे बढ़कर उपायका जानकार है, वह मनुष्य पण्डित कहलाता है ॥ ३२ ॥
प्रवृत्तवाक्चित्रकथ ऊहवान् प्रतिभानवान् ।
आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पण्डित उच्यते ॥ ३३ ॥
जिसकी वाणी कहीं रुकती नहीं, जो विचित्र ढंगसे बातचीत करता है, तर्कमें निपुण और प्रतिभाशाली है तथा जो ग्रन्थके तात्पर्यको शीघ्र बता सकता है, वह पण्डित कहलाता है ॥ ३३ ॥
श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा ।
असम्भिन्नाय्र्यमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः ॥ ३४ ॥
जिसकी विद्या बुद्धिका अनुसरण करती है और बुद्धि विद्याका तथा जो शिष्ट पुरुषोंकी मर्यादाका उल्लङ्घन नहीं करता, वही ‘पण्डित’ की पदवी पा सकता है ॥ ३४ ॥
अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः ।
अर्थांश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः ॥ ३५ ॥
बिना पढ़े ही गर्व करनेवाले, दरिद्र होकर भी बड़े-बड़े मनसूबे बाँधनेवाले और बिना काम किये ही धन पानेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको पण्डितलोग मूर्ख कहते हैं ॥ ३५ ॥
स्वमर्थं यः परित्यज्य परार्थमनुतिष्ठति ।
मिथ्या चरति मित्रार्थे यश्च मूढः स उच्यते ॥ ३६ ॥
जो अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरेके कर्तव्यका पालन करता है तथा मित्रके साथ असत् आचरण करता है, वह मूर्ख कहलाता है ॥ ३६ ॥
३० विदुरनीति
अकामान् कामयति यः कामयानान् परित्यजेत्।
बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ३७ ॥
जो न चाहनेवालोंको चाहता है और चाहनेवालोंको त्याग देता है तथा जो अपनेसे बलवान्के साथ वैर बाँधता है, उसे ‘मूढ़ विचारका मनुष्य’ कहते हैं ॥ ३७ ॥
अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च।
कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ३८ ॥
जो शत्रुको मित्र बनाता और मित्रसे द्वेष करते हुए उसे कष्ट पहुँचाता है तथा सदा बुरे कर्मोंका आरम्भ किया करता है, उसे ‘मूढ़ चित्तवाला’ कहते हैं ॥ ३८ ॥
संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते।
चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ ॥ ३९ ॥
भरतश्रेष्ठ ! जो अपने कर्मोंको व्यर्थ ही फैलाता है, सर्वत्र सन्देह करता है तथा शीघ्र होनेवाले काममें भी देर लगाता है, वह मूढ़ है ॥ ३९ ॥
श्राद्धं पितृभ्यो न ददाति दैवतानि न चार्चति।
सुहृन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ४० ॥
जो पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका पूजन नहीं करता तथा जिसे सुहृद् मित्र नहीं मिलता, उसे, ‘मूढ़ चित्तवाला’ कहते हैं ॥ ४० ॥
अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥ ४१ ॥
मूढ़ चित्तवाला अधम मनुष्य बिना बुलाये ही भीतर चला
पहला अध्याय ३१
आता है, बिना पूछे ही बहुत बोलता है तथा अविश्वसनीय मनुष्योंपर भी विश्वास करता है ॥ ४१ ॥
परं क्षिपति दोषेण वर्तमानः स्वयं तथा।
यश्च क्रुध्यत्यनीशानः स च मूढतमो नरः ॥ ४२ ॥
स्वयं दोषयुक्त बर्ताव करते हुए भी जो दूसरोंपर उसके दोष बताकर आक्षेप करता है तथा जो असमर्थ होते हुए भी व्यर्थका क्रोध करता है, वह मनुष्य महामूर्ख है ॥ ४२ ॥
आत्मनो बलमज्ञाय धर्मार्थपरिवर्जितम् ।
अलभ्यमिच्छन्नैष्कर्म्यान्मूढबुद्धिरिहोच्यते ॥ ४३ ॥
जो अपने बलको न समझकर बिना काम किये ही धर्म और अर्थसे विरुद्ध तथा न पानेयोग्य वस्तुकी इच्छा करता है, वह पुरुष इस संसारमें 'मूढबुद्धि' कहलाता है ॥ ४३ ॥
अशिष्यं शास्ति यो राजन् यश्च शून्यमुपासते ।
कदर्यं भजते यश्च तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ४४ ॥
राजन् ! जो अनधिकारीको उपदेश देता और शून्यकी उपासना करता है तथा जो कृपणका आश्रय लेता है, उसे मूढ़ चित्तवाला कहते हैं ॥ ४४ ॥
अर्थं महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव वा।
विचरत्यसमुन्नद्धो यः स पण्डित उच्यते ॥ ४५ ॥
जो बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्यको पाकर इठलाता नहीं चलता, वह पण्डित कहलाता है ॥ ४५ ॥
एकः सम्पन्नमश्नाति वस्ते वासश्च शोभनम् ।
योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसतरस्ततः ॥ ४६ ॥
१ यहाँ 'उपास्ते' के स्थानपर 'उपासते' यह प्रयोग आर्ष समझना चाहिये।
३२. विदुरनीति
जो अपनेद्वारा भरण-पोषणके योग्य व्यक्तियोंको बाँटे बिना अकेले ही उत्तम भोजन करता और अच्छा वस्त्र पहनता है, उससे बढ़कर क्रूर कौन होगा ॥ ४६ ॥
एकः पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजनः ।
भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते ॥ ४७ ॥
मनुष्य अकेला पाप करता है और बहुत-से लोग उससे मौज उड़ाते हैं। मौज उड़ानेवाले तो छूट जाते हैं; पर उसका कर्ता ही दोषका भागी होता है ॥ ४७ ॥
एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता ।
बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद् राष्ट्रं सराजकम् ॥ ४८ ॥
किसी धनुर्धर वीरके द्वारा छोड़ा हुआ बाण सम्भव है एकको भी मारे या न मारे। मगर बुद्धिमान्द्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजाके साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्रका विनाश कर सकती है ॥ ४८ ॥
एकया द्वे विनिश्चित्य त्रींश्चतुर्भिर्वशे कुरु ।
पञ्च जित्वा विदित्वा षट् सप्त हित्वा सुखी भव ॥ ४९ ॥
एक ( बुद्धि ) से दो ( कर्तव्य और अकर्तव्य ) का निश्चय करके चार ( साम, दाम, भेद, दण्ड ) से तीन ( शत्रु, मित्र, तथा उदासीन ) को वशमें कीजिये । पाँच ( इन्द्रियों ) को जीतकर छः ( सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रयरूप ) गुणोंको जानकर तथा सात ( स्त्री, जूआ, मृगया, मद्य, कठोर वचन, दण्डकी कठोरता और अन्यायसे धनका उपार्जन ) को छोड़कर सुखी हो जाइये ॥ ४९ ॥