विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० विदुरनीति
अकामान् कामयति यः कामयानान् परित्यजेत्।
बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ३७ ॥
जो न चाहनेवालोंको चाहता है और चाहनेवालोंको त्याग देता है तथा जो अपनेसे बलवान्के साथ वैर बाँधता है, उसे ‘मूढ़ विचारका मनुष्य’ कहते हैं ॥ ३७ ॥
अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च।
कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ३८ ॥
जो शत्रुको मित्र बनाता और मित्रसे द्वेष करते हुए उसे कष्ट पहुँचाता है तथा सदा बुरे कर्मोंका आरम्भ किया करता है, उसे ‘मूढ़ चित्तवाला’ कहते हैं ॥ ३८ ॥
संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते।
चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ ॥ ३९ ॥
भरतश्रेष्ठ ! जो अपने कर्मोंको व्यर्थ ही फैलाता है, सर्वत्र सन्देह करता है तथा शीघ्र होनेवाले काममें भी देर लगाता है, वह मूढ़ है ॥ ३९ ॥
श्राद्धं पितृभ्यो न ददाति दैवतानि न चार्चति।
सुहृन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ४० ॥
जो पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका पूजन नहीं करता तथा जिसे सुहृद् मित्र नहीं मिलता, उसे, ‘मूढ़ चित्तवाला’ कहते हैं ॥ ४० ॥
अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥ ४१ ॥
मूढ़ चित्तवाला अधम मनुष्य बिना बुलाये ही भीतर चला