विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ३१
आता है, बिना पूछे ही बहुत बोलता है तथा अविश्वसनीय मनुष्योंपर भी विश्वास करता है ॥ ४१ ॥
परं क्षिपति दोषेण वर्तमानः स्वयं तथा।
यश्च क्रुध्यत्यनीशानः स च मूढतमो नरः ॥ ४२ ॥
स्वयं दोषयुक्त बर्ताव करते हुए भी जो दूसरोंपर उसके दोष बताकर आक्षेप करता है तथा जो असमर्थ होते हुए भी व्यर्थका क्रोध करता है, वह मनुष्य महामूर्ख है ॥ ४२ ॥
आत्मनो बलमज्ञाय धर्मार्थपरिवर्जितम् ।
अलभ्यमिच्छन्नैष्कर्म्यान्मूढबुद्धिरिहोच्यते ॥ ४३ ॥
जो अपने बलको न समझकर बिना काम किये ही धर्म और अर्थसे विरुद्ध तथा न पानेयोग्य वस्तुकी इच्छा करता है, वह पुरुष इस संसारमें 'मूढबुद्धि' कहलाता है ॥ ४३ ॥
अशिष्यं शास्ति यो राजन् यश्च शून्यमुपासते ।
कदर्यं भजते यश्च तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ४४ ॥
राजन् ! जो अनधिकारीको उपदेश देता और शून्यकी उपासना करता है तथा जो कृपणका आश्रय लेता है, उसे मूढ़ चित्तवाला कहते हैं ॥ ४४ ॥
अर्थं महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव वा।
विचरत्यसमुन्नद्धो यः स पण्डित उच्यते ॥ ४५ ॥
जो बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्यको पाकर इठलाता नहीं चलता, वह पण्डित कहलाता है ॥ ४५ ॥
एकः सम्पन्नमश्नाति वस्ते वासश्च शोभनम् ।
योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसतरस्ततः ॥ ४६ ॥
१ यहाँ 'उपास्ते' के स्थानपर 'उपासते' यह प्रयोग आर्ष समझना चाहिये।