विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished172 पृष्ठ
पृष्ठ 20, कुल 172 में से
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( १८ )
| श्लोक | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १०-१३ | गुणवान् और विनयशीलका स्वभाव, दुष्टोंसे लेन-देन करनेमें दोष तथा उनको साथ रखनेकी भी निन्दा | १४३-१४४ |
| १४-१६ | महान् दोषोंसे युक्त पुरुष त्याज्य हैं, नीच पुरुषोंका प्रेम नश्वर होता है, नीचका स्वभाव और नीच पुरुषोंको दूरसे ही त्याग देनेकी प्रेरणा ... | १४४-१४५ |
| १७-३२ | जाति-भाइयोंकी रक्षा और सत्कारका महत्त्व बताते हुए उनसे मिलकर रहने और पाण्डवोंको उनका न्यायोचित हक देनेके लिये धृतराष्ट्रसे विदुरजीका अनुरोध ... ... | १४५-१४८ |
| ३३-३५ | कौन दीर्घकालतक यशका भागी होता है, कौनसा ज्ञान व्यर्थ है, किसका अभ्युदय और किसका पतन होता है ... ... | १४८-१४९ |
| ३६-३८ | मन्त्रभेदके छः द्वार और उन्हें बन्द रखनेका महत्त्व | १४९ |
| ३९-४१ | शास्त्रज्ञान और वृद्धोंकी सेवाका महत्त्व, कौन वस्तु कहाँ नष्ट होती है और बुद्धिमान् पुरुष कैसी मैत्री करे ... ... | १५० |
| ४२-४३ | किस गुणसे किस अवगुणका नाश होता है और कुलकी परीक्षा कैसे की जाती है ... | १५०-१५१ |
| ४४-४७ | स्वतःप्राप्त भोगसामग्रीका विरोध न करे, कैसे सुहृद्की सर्वथा रक्षा करनी चाहिये, कौन सैकड़ों कुलीनोंसे बढ़कर हैं और किनकी मित्रता कभी नष्ट नहीं होती ... ... | १५१ |
| ४८-५० | खोटी बुद्धिवालेको त्यागनेकी आवश्यकता, किनके साथ मित्रता न करे और मित्र कैसा होना चाहिये | १५२ |