विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ विदुरनीति
उसके ऐसा कहनेपर विदुरजी राजमहलके पास जाकर बोले—'द्वारपाल ! धृतराष्ट्रको मेरे आनेकी सूचना दे दो' ॥ ३ ॥
द्वाःस्थ उवाच
विदुरोऽयमनुप्राप्तो राजेन्द्र तव शासनात् ।
द्रष्टुमिच्छति ते पादौ किं करोतु प्रशाधि माम् ॥ ४ ॥
द्वारपालने जाकर कहा—'महाराज ! आपकी आज्ञासे विदुरजी यहाँ आ पहुँचे हैं, वे आपके चरणोंका दर्शन करना चाहते हैं । मुझे आज्ञा दीजिये, उन्हें क्या कार्य बताया जाय' ॥ ४ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
प्रवेशय महाप्रज्ञं विदुरं दीर्घदर्शिनम् ।
अहं हि विदुरस्यास्य नाकल्पो जातु दर्शने ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—'महाबुद्धिमान् दूरदर्शी विदुरको भीतर ले आओ, मुझे इस विदुरसे मिलनेमें कभी भी अड़चन नहीं है' ॥ ५ ॥
द्वाःस्थ उवाच
प्रविशान्तःपुरं क्षत्तर्महाराजस्य धीमतः ।
न हि ते दर्शनेऽकल्पो जातु राजाब्रवीद्धि माम् ॥ ६ ॥
द्वारपाल विदुरके पास आकर बोला—'विदुरजी ! आप बुद्धिमान् महाराज धृतराष्ट्रके अन्तःपुरमें प्रवेश कीजिये। महाराजने मुझसे कहा है कि मुझे विदुरसे मिलनेमें कभी अड़चन नहीं है' ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रविश्य विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम् ।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं चिन्तयानं नराधिपम् ॥ ७ ॥