विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ विदुरनीति
द्वेष्यो न साधुर्भवति न मेधावी न पण्डितः।
प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेष्ये पापानि चैव ह॥ ४ ॥
जिससे द्वेष हो जाता है, वह न साधु, न विद्वान और न बुद्धिमान् ही जान पड़ता है। प्रियतमके तो सभी कर्म शुभ ही प्रतीत होते हैं और दुश्मनके सभी काम पापमय ॥ ४ ॥
उक्तं मया जातमात्रेऽपि राजन्
दुर्योधनं त्यज पुत्रं त्वमेकम्।
तस्य त्यागात् पुत्रशतस्य वृद्धि-
रसत्यागात् पुत्रशतस्य नाशः॥ ५ ॥
राजन् ! दुर्योधनके जन्म लेते ही मैंने कहा था कि केवल इसी एक पुत्रको तुम त्याग दो। इसके त्यागसे सौ पुत्रोंकी वृद्धि होगी और इसका त्याग न करनेसे सौ पुत्रोंका नाश होगा ॥ ५ ॥
न वृद्धिर्बहु मन्तव्या या वृद्धिः क्षयमावहेत्।
क्षयोऽपि बहु मन्तव्यो यः क्षयो वृद्धिमावहेत् ॥ ६ ॥
जो वृद्धि भविष्यमें नाशका कारण बने, उसे अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिये और उस क्षयका भी बहुत आदर करना चाहिये; जो आगे चलकर अभ्युदयका कारण हो ॥ ६ ॥
न स क्षयो महाराज यः क्षयो वृद्धिमावहेत्।
क्षयः स त्विह मन्तव्यो यं लब्ध्वा बहु नाशयेत् ॥ ७ ॥
महाराज ! वास्तवमें जो क्षय वृद्धिका कारण होता है, वह क्षय ही नहीं है, किंतु उस लाभको भी क्षय ही मानना चाहिये, जिसे पानेसे बहुतोंका नाश हो जाय ॥ ७ ॥