विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 147, कुल 172 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय १४५
वैसे नीच, क्रूर तथा अजितेन्द्रिय पुरुषोंसे होनेवाले सङ्गपर अपनी बुद्धिसे पूर्ण विचार करके विद्वान् पुरुष उसे दूरसे ही त्याग दे ॥ १६ १/२ ॥
यो ज्ञातिमनुगृह्णाति दरिद्रं दीनमातुरम् ॥ १७ ॥ स पुत्रपशुभिर्वृद्धिं श्रेयश्चानन्त्यमश्नुते ।
जो अपने कुटुम्बी, दरिद्र, दीन तथा रोगीपर अनुग्रह करता है, वह पुत्र और पशुओंसे समृद्ध होता और अनन्त कल्याणका अनुभव करता है ॥ १७ १/२ ॥
ज्ञातयो वर्धनीयास्तैर्य इच्छन्त्यात्मनः शुभम् ॥ १८ ॥ कुलवृद्धिं च राजेन्द्र तस्मात् साधु समाचर ।
राजेन्द्र ! जो लोग अपने भलेकी इच्छा करते हैं, उन्हें अपने जाति-भाइयोंको उन्नतिशील बनाना चाहिये; इसलिये आप भलीभाँति अपने कुलकी वृद्धि करें ॥ १८ १/२ ॥
श्रेयसा योक्ष्यते राजन् कुर्वाणो ज्ञातिसत्क्रियाम् ॥ १९ ॥
राजन् ! जो अपने कुटुम्बीजनोंका सत्कार करता है, वह कल्याणका भागी होता है ॥ १९ ॥
विगुणा ह्यपि संरक्ष्या ज्ञातयो भरतर्षभ । किं पुनर्गुणवन्तस्ते त्वत्प्रसादाभिकाङ्क्षिणः ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ ! अपने कुटुम्बके लोग गुणहीन हों तो भी उनकी रक्षा करनी चाहिये । फिर जो आपके कृपाभिलाषी एवं गुणवान् हैं, उनकी तो बात ही क्या है ॥ २० ॥
प्रसादं कुरु वीराणां पाण्डवानां विशाम्पते । दीयन्तां ग्रामकाः केचित् तेषां वृत्त्यर्थमीश्वर ॥ २१ ॥