विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 149, कुल 172 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय
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सुवृत्तो भव राजेन्द्र पाण्डवान् प्रति मानद ।
अधर्षणीयः शत्रूणां तैर्वृतस्त्वं भविष्यसि ॥ २६ ॥
राजेन्द्र ! आप पाण्डवोंके प्रति सद्व्यवहार करें। मानद ! उनसे सुरक्षित होकर आप शत्रुओंके आक्रमणसे बचे रहेंगे ॥ २६ ॥
श्रीमन्तं ज्ञातिमासाद्य यो ज्ञातिरवसीदति ।
दिग्घहस्तं मृग इव स एनस्तस्य विन्दति ॥ २७ ॥
विषैले बाण हाथमें लिये हुए व्याधके पास पहुँचकर जैसे मृगको कष्ट भोगना पड़ता है, उसी प्रकार जो जातीय बन्धु अपने धनी बन्धुके पास पहुँचकर दुःख पाता है, उसके पापका भागी वह धनी होता है ॥ २७ ॥
पश्चादपि नरश्रेष्ठ तव तापो भविष्यति ।
तान् वा हतान् सुतान् वापि श्रुत्वा तदनुचिन्तय ॥ २८ ॥
नरश्रेष्ठ ! आप पाण्डवोंको अथवा अपने पुत्रोंको मारे गये सुनकर पीछे सन्ताप करेंगे; अतः इस बातका पहले ही विचार कर लीजिये ॥ २८ ॥
येन खट्वां समारूढः परितप्येत कर्मणा ।
आदावेव न तत् कुर्यादध्रुवे जीविते सति ॥ २९ ॥
इस जीवनका कोई ठिकाना नहीं है। जिस कर्मके करनेसे अन्तमें खाटपर बैठकर पछताना पड़े, उसको पहलेसे ही नहीं करना चाहिये ॥ २९ ॥
न कश्चिन्नापनयते पुमानन्यत्र भार्गवात् ।
शेषसम्प्रतिपत्तिस्तु बुद्धिमत्स्वेव तिष्ठति ॥ ३० ॥