विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय १४९
है, यदि उससे कर्तव्यका ज्ञान न हुआ अथवा ज्ञान होनेपर भी उसका अनुष्ठान न हुआ ॥ ३४ ॥
पापोदयफलं विद्वान् यो नारभति वर्धते । यस्तु पूर्वकृतं पापमविमृश्यानुवर्तते । अगाधपङ्के दुर्मेधा विषमे विनिपात्यते ॥ ३५ ॥
जो विद्वान् पापरूप फल देनेवाले कर्मोंका आरम्भ नहीं करता, वह बढ़ता है; किन्तु जो पूर्वमें किये हुए पापोंका विचार न करके उन्हींका अनुसरण करता, वह खोटी बुद्धिवाला मनुष्य अगाध कीचड़से भरे हुए बीहड़ नरकमें गिराया जाता है ॥ ३५ ॥
मन्त्रभेदस्य षट् प्राज्ञो द्वाराणीमानि लक्षयेत् । अर्थसंततिकामश्च रक्षेदेतानि नित्यशः ॥ ३६ ॥ मदं स्वप्नमविज्ञानमाकारं चात्मसम्भवम् । दुष्टामात्येषु विश्रम्भं दूताच्चाकुशलादपि ॥ ३७ ॥
बुद्धिमान् पुरुष मन्त्रभेदके इन छः द्वारोंको जाने और धनको रक्षित रखनेकी इच्छासे इन्हें सदा बन्द रखे—नशेका सेवन, निद्रा, आवश्यक बातोंकी जानकारी न रखना, अपने नेत्र, मुख आदिका विकार, दुष्ट मन्त्रियोंमें विश्वास और मूर्ख दूतपर भी भरोसा रखना ॥ ३६-३७ ॥
द्वाराण्येतानि यो ज्ञात्वा संवृणोति सदा नृप । त्रिवर्गाचरणे युक्तः स शत्रूनधितिष्ठति ॥ ३८ ॥
राजन् ! जो इन द्वारोंको जानकर सदा बंद किये रहता है वह अर्थ, धर्म और कामके सेवनमें लगा रहकर शत्रुओंको वशमें कर लेता है ॥ ३८ ॥