विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १५२ | विदुरनीति |
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दुर्बुद्धिमकृतप्रज्ञं छन्नं कूपं तृणैरिव । विवर्जयेत मेधावी तस्मिन् मैत्री प्रणश्यति ॥ ४८ ॥
मेधावी पुरुषोंको चाहिये कि दुर्बुद्धि एवं विचारशक्तिसे हीन पुरुषका तृणसे ढके हुए कुएँकी भाँति परित्याग कर दे, क्योंकि उसके साथ की हुई मित्रता नष्ट हो जाती है ॥ ४८ ॥
अवलिप्तेषु मूर्खेषु रौद्रसाहसिकेषु च । तथैवापेतधर्मेषु न मैत्रीमाचरेद् बुधः ॥ ४९ ॥
विद्वान् पुरुषको उचित है कि अभिमानी, मूर्ख, क्रोधी, साहसिक और धर्महीन पुरुषोंके साथ मित्रता न करे ॥ ४९ ॥
कृतज्ञं धार्मिकं सत्यमक्षुद्रं दृढभक्तिकम् । जितेन्द्रियं स्थितं स्थित्यां मित्रमत्यागि चेष्यते ॥ ५० ॥
मित्र तो ऐसा होना चाहिये जो कृतज्ञ, धार्मिक, सत्यवादी, उदार, दृढ़ अनुराग रखनेवाला, जितेन्द्रिय, मर्यादाके भीतर रहनेवाला और मैत्रीका त्याग न करनेवाला हो ॥ ५० ॥
इन्द्रियाणामनुत्सर्गो मृत्युनापि विशिष्यते । अत्यर्थं पुनरुत्सर्गः सादयेद् दैवतान्यपि ॥ ५१ ॥
इन्द्रियोंको सर्वथा रोक रखना तो मृत्युसे भी बढ़कर कठिन है और उन्हें बिलकुल खुली छोड़ देना देवताओंका भी नाश कर देता है ॥ ५१ ॥
मार्दवं सर्वभूतानामनसूया क्षमा धृतिः । आयुष्याणि बुधाः प्राहुर्मित्राणां चाविमानना ॥ ५२ ॥
सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति कोमलताका भाव, गुणोंमें दोष न