विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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विदुरनीति
अन्यो धनं प्रेतगतस्य भुङ्क्ते वयांसि चाग्निश्च शरीरधातून् । द्वाभ्यामयं सह गच्छत्यमुत्र पुण्येन पापेन च वेष्ट्यमानः ॥ १६ ॥
मरे हुए मनुष्यका धन दूसरे लोग भोगते हैं, उसके शरीरकी धातुओंको पक्षी खाते हैं या आग जलाती है। यह मनुष्य पुण्य-पापसे बँधा हुआ इन्हीं दोनोंके साथ परलोकमें गमन करता है ॥ १६ ॥
उत्सृज्य विनिवर्तन्ते ज्ञातयः सुहृदः सुताः । अपुष्पान्फलान् वृक्षान् यथा तात पतत्रिणः ॥ १७ ॥
तात ! बिना फल-फूलके वृक्षको जैसे पक्षी छोड़ देते हैं, उसी प्रकार उस प्रेतको उसके जातिवाले, सुहृद् और पुत्र चितामें छोड़कर लौट आते हैं ॥ १७ ॥
अग्नौ प्रास्तं तु पुरुषं कर्मान्वेति स्वयंकृतम् । तस्मात्तु पुरुषो यत्नाद् धर्मं संचिनुयाच्छनैः ॥ १८ ॥
अग्निमें डाले हुए उस पुरुषके पीछे तो केवल उसका अपना किया हुआ बुरा या भला कर्म ही जाता है। इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह धीरे-धीरे प्रयत्नपूर्वक धर्मका ही संग्रह करे ॥ १८ ॥
अस्माल्लोकादूर्ध्वममुष्य चाधो महत्तमस्तिष्ठति ह्यन्धकारम् । तद् वै महामोहनमिन्द्रियाणां बुध्यस्व मा त्वां प्रलभेत राजन् ॥ १९ ॥
इस लोक और परलोकसे ऊपर और नीचेतक सर्वत्र अज्ञान-रूप महान् अन्धकार फैला हुआ है, वह इन्द्रियोंको महान् मोहमें