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विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)

Vidura Niti Gita Press

महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished172 पृष्ठ

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विदुरनीति

प्रज्ञावृद्धं धर्मवृद्धं स्वबन्धुं विद्यावृद्धं वयसा चापि वृद्धम्। कार्याकार्ये पूजयित्वा प्रसाद्य यः सम्पृच्छेन्न स मुह्येत् कदाचित् ॥ २३ ॥

जो बुद्धि, धर्म, विद्या और अवस्थामें बड़े अपने बन्धुको आदर-सत्कारसे प्रसन्न करके उससे कर्तव्य-अकर्तव्यके विषयमें प्रश्न करता है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता ॥ २३ ॥

धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा। चक्षुःश्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च कर्मणा ॥ २४ ॥

शिश्न और उदरकी धैर्यसे रक्षा करे, अर्थात् कामवेग और भूखकी ज्वालाको धैर्यपूर्वक सहे। इसी प्रकार हाथ-पैरकी नेत्रोंसे, नेत्र और कानोंकी मनसे तथा मन और वाणीकी सत्कर्मोंसे रक्षा करे ॥ २४ ॥

नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती नित्यस्वाध्यायी पतितान्नवर्जी। सत्यं ब्रुवन् गुरवे कर्म कुर्वन् न ब्राह्मणश्च्यवते ब्रह्मलोकात् ॥ २५ ॥

जो प्रतिदिन जलसे स्नान-सन्ध्या-तर्पण आदि करता है, नित्य यज्ञोपवीत धारण किये रहता है, नित्य स्वाध्याय करता है, पतितोंका अन्न त्याग देता है, सत्य बोलता और गुरुकी सेवा करता है, वह ब्राह्मण कभी ब्रह्मलोकसे भ्रष्ट नहीं होता ॥ २५ ॥

अधीत्य वेदान् परिसंस्तीर्य चाग्नी- निष्ट्वा यज्ञैः पालयित्वा प्रजाश्च। गोब्राह्मणार्थे शस्त्रपूतान्तरात्मा हतः संग्रामे क्षत्रियः स्वर्गमेति ॥ २६ ॥