विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ४५
न बोलना, शक्तिके अनुसार दान और कृतज्ञता—ये आठ गुण पुरुषकी ख्याति बढ़ा देते हैं ॥१०४ ॥
नवद्वारमिदं वेश्म त्रिस्थूणं पञ्चसाक्षिकम् ।
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं विद्वान् यो वेद स परः कविः ॥ १०५ ॥
जो विद्वान् पुरुष [ आँख, कान आदि ] नौ दरवाजेवाले, तीन ( वात, पित्त तथा कफरूपी ) खम्भोंवाले, पाँच ( ज्ञानेन्द्रियरूप ) साक्षीवाले आत्माके निवासस्थान इस शरीररूपी गृहको जानता है, वह बहुत बड़ा ज्ञानी है ॥ १०५ ॥
दश धर्मं न जानन्ति धृतराष्ट्र निबोध तान् ।
मत्तः प्रमत्त उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धो बुभुक्षितः ॥ १०६ ॥
त्वरमाणश्च लुब्धश्च भीतः कामी च ते दश ।
तस्मादेतेषु सर्वेषु न प्रसज्जेत पण्डितः ॥ १०७ ॥
महाराज धृतराष्ट्र ! दस प्रकारके लोग धर्मको नहीं जानते, उनके नाम सुनो । नशेमें मतवाला, असावधान, पागल, थका हुआ, क्रोधी, भूखा, जल्दबाज, लोभी, भयभीत और कामी—ये दस हैं । अतः इन सब लोगोंमें विद्वान् पुरुष आसक्ति न बढ़ावे ॥ १०६-१०७ ॥
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पुत्रार्थमसुरेन्द्रेण गीतं चैव सुधन्वना ॥ १०८ ॥
इसी विषयमें असुरोंके राजा प्रह्लादने सुधन्वाके साथ अपने पुत्रके प्रति कुछ उपदेश दिया था। नीतिज्ञ लोग उस पुराने इतिहासका उदाहरण देते हैं ॥ १०८ ॥