विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय
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विद्यामदो धनमदस्तृतीयोऽभिजनो मदः ।
मदा एतेऽवलिप्तानामेत एव सतां दमाः ॥ ४४ ॥
विद्याका मद, धनका मद और तीसरा ऊँचे कुलका मद है। ये घमण्डी पुरुषोंके लिये तो मद हैं, परंतु सज्जन पुरुषोंके लिये दमके साधन हैं ॥ ४४ ॥
असन्तोऽभ्यर्थिताः सद्भिः क्वचित्कार्ये कदाचन ।
मन्यन्ते सन्तमात्मानमसन्तमपि विश्रुतम् ॥ ४५ ॥
कभी किसी कार्यमें सज्जनोंद्वारा प्रार्थित होनेपर दुष्टलोग अपनेको प्रसिद्ध दुष्ट जानते हुए भी सज्जन मानने लगते हैं ॥४५॥
गतिरात्मवतां सन्तः सन्त एव सतां गतिः ।
असतां च गतिः सन्तो न त्वसन्तः सतां गतिः ॥ ४६ ॥
मनस्वी पुरुषोंको सहारा देनेवाले सन्त हैं, सन्तोंके भी सहारे सन्त ही हैं; दुष्टोंको भी सहारा देनेवाले सन्त हैं, पर दुष्टलोग सन्तोंको सहारा नहीं देते ॥ ४६ ॥
जिता सभा वस्त्रवता मिष्टाशा गोमता जिता ।
अध्वा जितो यानवता सर्वं शीलवता जितम् ॥ ४७ ॥
अच्छे वस्त्रवाला सभाको जीतता (अपना प्रभाव जमा लेता) है, जिसके पास गौ है, वह मीठे खाद्यकी आकाङ्क्षाको जीत लेता है; सवारीसे चलनेवाला मार्गको जीत लेता (तय कर लेता) है और शीलवान् पुरुष सबपर विजय पा लेता है ॥ ४७ ॥
शीलं प्रधानं पुरुषे तद् यस्येह प्रणश्यति ।
न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः ॥ ४८ ॥