विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व - गीताप्रेस गोरखपुर)
Vidura Niti Gita Press
महात्मा विदुर / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 172 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय
विदुर उवाच
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
आत्रेयस्य च संवादं साध्यानां चेति नः श्रुतम् ॥ १ ॥
विदुरजी कहते हैं—इस विषयमें दत्तात्रेय और साध्य देवताओंके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, यह मेरा भी सुना हुआ है ॥ १ ॥
चरन्तं हंसरूपेण महर्षिं संशितव्रतम् ।
साध्या देवा महाप्राज्ञं पर्यपृच्छन्त वै पुरा ॥ २ ॥
प्राचीन कालकी बात है, उत्तम व्रतवाले महाबुद्धिमान् महर्षि दत्तात्रेयजी हंस ( परमहंस ) रूपसे विचर रहे थे, उस समय साध्य देवताओंने उनसे पूछा—॥ २ ॥
साध्या ऊचुः
साध्या देवा वयमेते महर्षे
दृष्ट्वा भवन्तं न शक्नुमोऽनुमातुम् ।
श्रुतेन धीरो बुद्धिमांस्त्वं मतो नः
काव्यां वाचं वक्तुमर्हस्युदाराम् ॥ ३ ॥
साध्य बोले—महर्षे ! हम सब लोग साध्य देवता हैं, आपको केवल देखकर हम आपके विषयमें कुछ अनुमान नहीं कर सकते । हमें तो आप शास्त्रज्ञानसे युक्त, धीर एवं बुद्धिमान् जान