विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६ : विज्ञानभैरव साधक योगी स्वाभाविक रूप से उठते हुए संविद्, अर्थात् ज्ञान के जिस किसी भी प्रकार को पूर्वोक्त स्थानों के बीच में से जिस किसी भी प्रदेश से द्वादशान्त में ले जाकर वहाँ प्रति क्षण बार-बार मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करे । ऐसा करने से मन की वृत्तियों के क्षीण हो जाने से उसकी चंचलता शान्त हो जाती है और वह योगी थोड़े ही समय में अपने भीतर विलक्षणता का, अर्थात् असामान्य परभैरव के स्वरूप की अभिव्यक्ति का, अनुभव करने लगता है । 'यथा यथा यत्र यत्र' इस पाठ में जिस जिस प्रकार से जिस जिस विषय में मन को लगाया जाता है, उसी उसी प्रकार से वहाँ वहाँ वैलक्षण्य का आविर्भाव होता है, इस तरह का अन्वय किया जाता है । तन्त्रालोक के— शाक्ते क्षोभे कुलावेशे सर्वनाड्यग्रगोचरे । व्याप्तौ सर्वात्मसंकोचे हृदयं प्रविशेत् सुधीः ॥ (५।७१) इस श्लोक में 'सर्वनाड्यग्रगोचरे' इस पद से इसी स्थिति का वर्णन किया गया है । सभी नाडियों के अग्रभाग में द्वादशान्त की ही स्थिति मानी जाती है ॥५०॥ [ धारणा-२८ ] १कालाग्निना कालपदादुत्थितेन स्वकं पुरम् । प्लुष्टं विचिन्तयेदन्ते शान्ताभा२स्सस्तदा भवेत् ॥५१॥ कालपदाद् दक्षिणपादाङ्गुष्ठाद् उत्थितेन कालाग्निना स्वकं पुरम् आत्मीयं देहमेव गुग्गुलम् "ॐ र क्ष र य ऊं तनुं दाहयामि नमः" इति मन्त्रोच्चारपूर्वकं शरीर- दाहादिचिन्तनयोगयुक्त्या आत्मभावनया प्लुष्टं विचिन्तयेन् दग्धं विभावयेत् । तदा अन्ते स योगी शान्ताभासो भवेद् अभिव्यक्तस्वात्मस्वरूपः स्यात् । 'शान्ताभासः प्रजायते' इति पाठे योगिनश्चिन्मयमूर्तिमान् विभावसुः प्रकाशत इत्यर्थः ॥५१॥ "ॐ र क्ष र य ऊं तनुं दाहयामि नमः" इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए कालपद, अर्थात् दाहिने पैर के अँगूठे से उठती हुई कालाग्नि का ध्यान करके, उसकी ज्वाला से मेरा पूरा शरीर भस्म हो गया है, ऐसी भावना करे । यहाँ अपने शरीर को ही गुग्गुल समझे । गुग्गुल जैसे अग्नि में भस्म हो जाती है, उसी तरह से साधक अपने शरीर के संबन्ध में भी, वह कालाग्नि में जल गया है, इस तरह की भावना करे । पुर शब्द गुग्गुल का भी पर्यायवाची है और यह शब्द देह का भी बोधक होता है । यहाँ इस श्लिष्ट पद के प्रयोग का यह अभिप्राय है कि गुग्गुल जैसे जल कर सर्वत्र सुगन्धि फैला देता है और वातावरण को विषाक्त कीटाणुओं के प्रभाव से निर्मुक्त कर देता है, उसी तरह से उक्त भावना के अभ्यास से साधक सभी १. °पुरा°-ख० । २. °सः प्रजायते-ख० शि० म० ।
- यह श्लोक शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३८) और महार्थमंजरीपरिमल (पृ० ११२) में विद्यमान है ।