भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ५७ मलों (दोषों) से निर्मुक्त होकर अपने शान्त स्वरूप को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् उसके समक्ष चिन्मय मूर्तिमान् अग्नि प्रकाशित हो उठती है । महार्थमंजरी की— शोषो मलस्य नाशो दाह एतस्य वासनोच्छेदः । आप्लावनं तनूनां ज्ञानसुधासेकनिर्मिता शुद्धिः ॥ (४४ श्लो०) इस गाथा में प्राणायाम के अभ्यास से शोष, दाह और आप्लावन की प्रक्रिया के आधार पर साधक के देह को अमृतमय बना देने की बात कही गई है । 'देवो भूत्वा देवं यजेत्' इस विधिवाक्य की सिद्धि के लिए इसी प्रक्रिया का सहारा लिया जाता है । भूतशुद्धि और प्राण- प्रतिष्ठा के माध्यम से भी इसी स्थिति तक पहुँचा जाता है । “शरीरे संहारः कलानाम्” (३।४) इस शिवसूत्र में भी यही बात वर्णित है ।।५१।। [ धारणा-२९ ] एवमेव जगत्सर्वं दग्धं ध्यात्वा विकल्पतः । अनन्यचेतसः पुंसः पुंभावः परमो भवेत् ॥५२॥ एवमेव कालपदादुत्थितेन कालाग्निना देहस्थं बाह्यस्थं च सर्वं जगद् विकल्पतो दग्धं ध्यात्वा नामरूपतः प्लुष्टं विभाव्य वर्तमानस्य अनन्यचेतसो निर्विकल्पचित्तस्य पुंसो योगिनः परमः पुंभावो भवेत् अपरिमितप्रमातृभैरवता प्रकाशते । अत्र पूर्वोक्त- धारणार्थ एव दृढीकृतः, परन्तु पूर्वं स्वपुरदाहचिन्तनमुक्तम्, इह सर्वजगद्दाहभावनेति विशेषः ।।५२।। इसी तरह से कालपद से उठी कालाग्नि की ज्वाला से देह के भीतर और बाहर वर्तमान सारे जगत् के सभी पदार्थ भस्म हो गये हैं, ऐसी भावना का अभ्यास करने वाले, अनन्यचित्त, निर्विकल्प स्वभाव, योगी के हृदय में परम पुंभाव (पुरुषार्थ), अर्थात् अपरिमित प्रमाता के रूप में वर्तमान भैरव का स्वरूप आविर्भूत हो जाता है। एक प्रकार से यहाँ पूर्वोक्त धारणा की ही पुष्टि की गई है, किन्तु इनमें अन्तर इतना है कि पहले श्लोक में केवल अपने शरीर के भस्म हो जाने की भावना बताई गई है और इसमें सारे जगत् के दाह की भावना वर्णित है ।।५२ ।। [ धारणा-३० ] स्वदेहे जगतो वापि सूक्ष्मसूक्ष्मतराणि च । तत्त्वानि यानि निलयं ध्यात्वान्ते व्यज्यते परा ॥५३॥ स्वदेहे निजदेहविषये संबद्धानि, जगतो वापि अथवा सर्वस्य जगतः संबन्धीनि यानि सूक्ष्माणि सूक्ष्मतराणि च तत्त्वानि प्रकृतिमहदहङ्कारादीनि तथा पृथिव्यादीनि तद्विकारभूतानि च यानि सन्ति, तेषां निलयं स्वस्वकारणेषु मृत्तिदशायां लयं ध्यात्वा अन्ते पर्यन्ते परा देवी व्यज्यते प्रकटीभवति । 'तत्त्वाति यातानि लयम्' इति पाठे तु सर्वतत्त्वानि लयं यातानि नष्टप्रायाण्येवेति ध्यात्वा पराभट्टारिकाविर्भावो भवेदित्यर्थः ।