भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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५८ : विज्ञानभैरव अयमत्र तात्पर्यार्थः—मयूराण्डरसन्यायेन परा देवी सर्वमेतदन्तःस्थितमेव बहिः प्रकाश- यति । अनया धारणया सर्वभेदाभेदगलनायां साधकः परोदयः स्यादेवेति ॥५३॥ अपने देह में वर्तमान अथवा इस सारे जगत् में विद्यमान जो सूक्ष्म से सूक्ष्मतर प्रकृति, महान्, अहङ्कार प्रभृति तथा पृथिवी प्रभृति पंच महाभूत और उनके विकारभूत मांस, अस्थि आदि तत्त्व हैं, उनके विषय में ये अपने-अपने कारणों में लीन हो रहे हैं, इस तरह की भावना करने पर अन्त में परा देवी प्रकाशित हो जाती है । 'तत्त्वानि यातानि लयम्' ऐसा भी पाठ मिलता है । इसका अर्थ यह है कि सभी तत्त्व अपने-अपने कारणों में लीन हो गये हैं, प्रायः नष्ट हो गये हैं, इस तरह की भावना करने से परा देवी प्रकट हो जाती है । इसका अभिप्राय यह है कि परा भट्टारिका ही मयूराण्डरस न्याय¹ से अपने भीतर वर्तमान इस पूरे जगत् को बाहर प्रकाशित कर देती है । जो साधक इस बात को समझ कर परा देवी में ही सारे जगत् को समर्पित कर देता है, तो सभी भेदों और उपभेदों के विगलित हो जाने से वह परम उदय की अवस्था को प्राप्त कर लेता है ॥५३॥ [ धारणा-३१ ] ²पीनां च दुर्बलां ¹शक्तिं ध्यात्वा द्वादशगोचरे । प्रविश्य हृदये ध्यायन् मुक्तः³ स्वातन्त्र्यमाप्नुयात् ॥५४॥ शक्तिं प्राणशक्तिम्, आदौ पीनां पीवराम् अन्नपानादिभोजनदिशा पीनत्वं प्राप्ताम्, ततः क्रमेण दुर्बलां कृशां गुरूपदेशमार्गेण कुम्भकादिना सूक्ष्मां भवन्तीं द्वादश- गोचरे द्वादशान्ते ध्यात्वा, हृदये प्रविश्य च ध्यायन् साधको मुक्तः सन् स्वातन्त्र्य- माप्नुयात् स्वतन्त्रपरमेश्वरस्वरूपः स्यात् ॥५४॥ भर पेट भोजन-पानी पाने से मोटी अकल के आरामतलबी आदमी का शरीर ही नहीं, प्राण शक्ति भी मोटी हो जाती है । बाद में सद्गुरु का उपदेश पाकर जब वह योगाभ्यास में लग जाता है, कुम्भक प्रभृति प्राणायामों का अभ्यास करने लगता है, तो धीरे-धीरे उसके शरीर के मोटापे के साथ ही प्राण-वायु भी कृश होती जाती है, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जाती है । इसी सूक्ष्म प्राणशक्ति का द्वादशान्त स्थान में और हृदय में भी प्रविष्ट होकर जो साधक ध्यान करता है, वह मुक्त होकर अपनी स्वाभाविक स्वतन्त्र स्थिति को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् उसमें परमेश्वर की स्वातन्त्र्य शक्ति, जो कि उसका अपना ही स्वरूप है, १. चेव-त० । २. ºयेत् सुप्तः स्वाच्छन्द्यº-त० । ३. स्वप्नº-स्प० ।

  1. इस न्याय का अभिप्राय यह है कि मयूर (मोर) के अण्डे के रस में किसी प्रकार की विचित्रता के न रहते हुए भी जैसे उससे रंग-बिरंगे पक्षी (मोर) की उत्पत्ति होती है, उसी तरह से परा शक्ति से भी इस चित्र-विचित्र जगत् की सृष्टि होती है ।
  2. यह श्लोक स्पन्दनिर्णय (पृ० ५६) और तन्त्रालोक तथा उसकी टीका विवेक (भा० ९, आ० १५, पृ० २४०, २४३) में मिलता है ।