विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ५९ पूर्णतया अभिव्यक्त हो जाती है। "यथेच्छाभ्यर्थितो धाता" इस स्पन्दकारिका की व्याख्या करते हुए क्षेमराज ने स्पन्दनिर्णय (पृ० ५५-५६) में इस स्थिति की अधिक स्पष्ट व्याख्या की है। अभिनवगुप्त ने भी तन्त्रालोक (१५।४८०-४८१) में विज्ञानभैरव के इस श्लोक को प्रमाण रूप में उद्धृत कर शिष्यदीक्षा के प्रसंग से इसको जोड़ा है कि इस धारणा के अभ्यास से गुरु शिष्य के अन्तःकरण में प्रविष्ट होकर उसमें आध्यात्मिक शक्ति का संचार करता है ॥५४॥ [ धारणा-३२ ] १भुवनाध्वादिरूपेण चिन्तयेत् क्रमशोऽखिलम् । स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या यावदन्ते मनोलयः ॥५५॥ भुवनाध्वादिरूपेण भुवन-तत्त्व-कला-मन्त्र-पद-वर्णाख्यो यः षोढा २वाच्यवाचक- रूपोऽध्वा शब्दार्थमयस्तस्याध्वनः स्थूलसूक्ष्मपररूपतया क्रमशूर्ऽखिलं जगत् चिन्तयेत्, यावदन्ते तत्रैव मनोलयः पराकाष्ठावगतिः स्यात् ॥५५॥ भुवन, तत्त्व, कला, मन्त्र, पद और वर्ण—ये तन्त्रशास्त्र में षडध्व के नाम से प्रसिद्ध हैं। वस्तुतः यह वाच्य और वाचक के रूप में विद्यमान शब्द और अर्थ का ही विस्तार है। शब्द से वर्ण, पद और मन्त्र की और अर्थ से कला, तत्त्व, भुवन की उत्पत्ति होती है। स्थूल, सूक्ष्म और पर रूप में विद्यमान इन षडध्वों से क्रमशः यह सारा जगत् व्याप्त है। योगी इस भावना का तब तक अभ्यास करता रहे, जब तक कि अन्ततः उसका मन इसी में लीन नहीं हो जाता। इस विषय को कुछ विस्तार से समझने की आवश्यकता है। तान्त्रिक दीक्षा में षडध्व की शुद्धि अनिवार्य मानी जाती है। प्रायः सभी ग्रन्थों में, विशेष कर शैवागम के ग्रन्थों में, इसका विस्तार से वर्णन मिलता है। वस्तुतः यह सारा जगत् पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप में, वाचक और वाच्य के रूप में, शब्द और अर्थ के रूप में प्रतीत हो रहे उस विश्वातीत और विश्वात्मक परब्रह्म की क्रियाशक्ति का ही विस्तार मात्र है। शब्दब्रह्म ही षडध्व के रूप में परिणत होता है। इनमें से वर्ण का इस विश्व के साथ अभेदात्मक, मन्त्र का भेदाभेदात्मक और पद का भेदात्मक संबन्ध रहता है। इसमें पहला अध्व उसके बाद के अध्व में व्यापक रूप से रहता है और बाद का अध्व अपने पहले अध्व में व्याप्य रूप से रहता है। इस तरह से ये सभी अध्व परस्पर व्याप्यव्यापकभाव से सब में स्थित हैं। इसीलिये शास्त्रों में जहाँ-तहाँ
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३८) और महार्थमंजरी की परिमल टीका (पृ० ७१, १४२) में यह उद्धृत है।
- शब्द और अर्थ के वाच्यवाचकभाव संबन्ध का निरूपण पृ० ६ की पहली टिप्पणी में किया जा चुका है।