भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ६१ बढ़ते हैं, तो सूक्ष्मस्वभाव भेदाभेद दृष्टि के प्रतिनिधि नादात्मक मन्त्र के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। पुनः आगे बढ़ने पर स्थूल-स्वभाव भेद दृष्टि को पैदा करने वाले पदों का आविर्भाव होता है। इसी तरह से वाच्यरूपा पारमेश्वरी कला-शक्ति उत्तरोत्तर स्थूल-स्वरूप को धारण करती हुई अन्ततः भुवनाध्व का रूप धारण करती है। वास्तव में यद्यपि परमेश्वर की इस शक्ति का स्फुरण बिना क्रम के ही होता है, तथापि अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति की सहायता से यह दर्पण में दिखाई पड़ने वाले विभिन्न प्रतिबिम्बों की भांति उनमें क्रम का आभास भी कराती है। जब क्रम का आभास होने लगता है, तो उसमें पहले आविर्भूत हुआ पदार्थ बाद में आविर्भूत हुए पदार्थ में व्यापक रूप से उसी तरह से विद्यमान रहता है, जैसे कि घट में मृत्तिका व्यापक रूप से रहती है। बाद में आविर्भूत होने वाला पदार्थ अपने पूर्ववर्ती कारण पदार्थ में शक्ति के रूप में उसी तरह से छिपा रहता है, जैसे कि वृक्ष अपने बीज में छिपा रहता है। इस तरह से विश्व के सभी पदार्थ एक दूसरे से परस्पर संबद्ध हैं, अतः कहा जा सकता है कि सभी¹ पदार्थ सर्वात्मक हैं। इस तरह से प्रत्येक प्रमाता अथवा भाव में वस्तुतः षडध्व का विस्तार देखा जा सकता है और यह सब कुछ परमेश्वर की स्वातन्त्र्य शक्ति का ही विलास है। अकार से लेकर हकार पर्यन्त वर्णों का परामर्श जब परिपक्व हो जाता है, तो उसका अहन्ता में विश्राम होता है। पर भैरव का ही यह सारा खिलवाड़ है। इस तरह से भुवन आदि षडध्व के रूप में इस जगत् का ही विस्तार होता है, ऐसा विचार कर स्थूलतर का स्थूल में, स्थूल का सूक्ष्म में और सूक्ष्म का पर भाव में, अर्थात् चिन्मात्र के बोध में विलयन कर देना चाहिये। इस अध्वशोधन की प्रक्रिया के आधार पर शिव तत्त्व के स्वरूप का विमर्श (चिन्तन) करने से साधक का चित्त विलीन हो जाता है। इस पूरे प्रकरण को शिवोपाध्याय ने— भुवनादित्रयं वाच्यं पदादिवाचकं त्रयम्। शक्तिरेतच्चाध्वषट्कं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ॥ इस एक श्लोक में संगृहीत कर दिया है, अर्थात् भुवन प्रभृति तीन अध्व वाच्य वर्ग में और पद आदि तीन वाचक वर्ग में प्रविष्ट हैं। यह अध्वषट्क स्वातन्त्र्य शक्ति का ही विस्तार है और इस शक्ति का अधिपति महेश्वर है, परभैरव शिव स्वयं इसका अधिष्ठाता है। महार्थमंजरीकार महेश्वरानन्द ने— यदध्वनां च षट्कं तत्र प्रकाशार्थलक्षणमर्धम् । विमर्शशब्दस्वभावमर्धमिति शिवस्य यामलोल्लासः ॥ २७॥

  1. सभी पदार्थों की सर्वात्मकता का विवेचन "घटादौ" (श्लो० १०३) इत्यादि कारिका की व्याख्या के अवसर पर किया गया है। इस विषय को अधिक विस्तार से समझने के लिये शिवदृष्टि के प्रथम और पंचम आह्निक के इस विषय से संबद्ध अन्तिम अंश का और महार्थमंजरी की गाथा ३२-३३ की परिमल टीका का अवलोकन करना चाहिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)