भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 119

६२ : विज्ञानभैरव स्थूलतरेष्वपि प्रेक्षध्वं भूतेषु खस्य निर्मलावस्थाम्। षट्त्रिंशिकातिलङ्घी कीदृशो भवतु सोमनाथः सः ॥५७॥ इन दो कारिकाओं की स्वनिर्मित परिमल व्याख्या में इसी विषय पर अन्य दृष्टिकोणों से भी विचार किया है ॥५५॥ [ धारणा-३३ ] १अस्य 'सर्वस्य विश्वस्य पर्यन्तेषु समन्ततः । अध्वप्रक्रियया तत्त्वं २शैव ध्यात्वा महोदयः ॥५६॥ अस्य सर्वस्य विश्वस्य पर्यन्तेषु समन्ततोऽध्वप्रक्रियया शैवं तत्त्वं ध्यात्वा अध्व- षट्केषु भुवनाध्वादिषु सामान्यतया विशेषतया वा न किमपि प्रकाशविमर्शात्मकशिवतत्त्वं विना सारभूतमिति षडध्वशोधनप्रक्रियया विज्ञाय महोदयः प्रकाशाभिव्यक्तिः परम- शिवावभासः स्यात् ॥५६॥ प्रकाश और विमर्श स्वरूप परमेश्वर ही शिव है। शैव तत्त्व उस शिव के स्वरूप को कहते हैं। शिव के इस स्वरूप का ध्यान करने पर साधक का महान् उदय हो जाता है, अर्थात् उसमें प्रकाश का आविर्भाव हो जाता है। इसलिये कि भुवन, तत्त्व और कलात्मक वाच्य वर्ग प्रकाश से आविर्भूत है और वर्ण, मन्त्र एवं पदस्वरूप वाचक वर्ग विमर्श से उद्भूत है। दो अरणियों (लकड़ियों) के संसर्ग से जैसे अग्नि पैदा होती है, उसी तरह से इन दोनों के संसर्ग से यह सारा जगत् आविर्भूत होता है। उन्मेष और निमेष नामक दो शक्तियों की सहायता से ही शिव इस जगत् की सृष्टि और संहार करता रहता है। इस षडध्वमय जगत् का स्वरूप शिव के स्वरूप को छोड़कर दूसरा कुछ भी नहीं है, अतः जगत् के स्वरूप को छोड़कर केवल शिव का ध्यान करने वाले योगी का महान् उदय हो जाता है, अर्थात् उसको परमशिव का साक्षात्कार प्राप्त हो जाता है। शिव के इस स्वरूप की व्याख्या कर्मकाण्डक्रमावली के निम्न श्लोक में मिलती है— २त्रयीसप्तचतुर्युग्ममये त्रितयवर्त्मनि । स्थितो यः शक्तिसहितः स जयत्यमृतेश्वरः ॥ अर्थात् यह अमृतेश्वर मृत्युंजय भट्टारक शिव प्रथमतः अनुत्तर (अ), इच्छा (इ) और उन्मेष (उ) स्वरूप तीन ह्रस्व स्वरों के रूप में और बाद में आनन्द (आ), ईशन (ई), ऊर्मि (ऊ) तथा षण्ढ स्वर (ऋ ॠ ऌ ॡ) स्वरूप सात स्वरों के रूप में, तब चार सन्ध्यक्षरों १. विश्वस्य सर्वस्य-तवि० । २. ध्यात्वा शैवं-ख० ।

  1. तन्त्रालोकविवेक (भा० ७, आ० १२, पृ० ९५) में यह श्लोक मिलता है ।
  2. सोमशम्भु कृत कर्मकाण्डक्रमावली के तीन संस्करण प्रकाशित हुए हैं । उनमें यह श्लोक कहीं उपलब्ध नहीं होता ।