भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ६३ (ए ऐ ओ औ) के रूप में और अन्ततः अनुस्वार और विसर्जनीय इन दो स्वरों के रूप में, अर्थात् षोडश कलात्मक पुरुष के स्वभाव में परिणत होता है। उस अमृतेश्वर शिव का यह त्रयीसप्तचतुर्युग्ममय, षोडश कलात्मक स्वरूप बाद में वर्ण, मन्त्र और पद नामक अध्वत्रय में, जो कि वाचक के रूप में इस संसार के समस्त भावों के साथ अभेद, भेदाभेद और भेद दृष्टि से वर्तमान रहते हैं, प्रविष्ट हो जाता है। इस स्थिति में उसका अपनी कला नामक शक्ति की सहायता से तत्त्व, भुवन और कला नामक अध्वत्रय में प्रविष्ट हुई शक्ति से साक्षात्कार हो जाता है, जो कि वाच्य अध्वा के नाम से शास्त्रों में प्रसिद्ध है। इस शक्तिस्वरूप वाच्य अध्वा के साथ वाचक अध्वा के रूप में परिणत यह कालभक्षक, कालवंचक, मृत्युंजय भट्टारक (अमृतेश्वर) ही इस सारे संसार को जीतकर, अपने में समेट कर अपने सर्वोत्तम परप्रकाशमय स्वरूप में सदा विराजमान रहता है। यद्यपि यह शिव और शक्ति का परिणाम षडध्व के रूप में होता है, किन्तु वाच्य अध्वा का अन्तर्भाव वाचक अध्वा में मान लिया जाता है। इस तरह से 'त्रितयवर्त्मनि' शब्द से षडध्व का ग्रहण किया जाता है। अथवा यह भी कहा जा सकता है कि वाच्य और वाचक प्रत्येक अध्वा त्रितयात्मक है। फलितार्थ यह हुआ कि इस षडध्वप्रक्रिया का सहारा लेकर साधक अपनी महोदय अवस्था तक, स्वरूप-साक्षात्कार तक पहुँच सकता है। इस विषय को तन्त्रालोक के द्वादश आह्निक में अभिनवगुप्त ने— आसंवित्त्वमाबाह्यं योऽयमध्वा व्यवस्थितः। तत्र तत्रोचितं रूपं स्वं स्वातन्त्र्येण भासयेत् ॥४॥ इत्यादि श्लोकों में विस्तार से समझाया है ॥५६॥ [ धारणा-३४ ] विश्वमेतन्महादेवि शून्यभूतं विचिन्तयेत् । तत्रैव च मनो लीनं ततस्तल्लयभाजनम् ॥५७॥ हे महादेवि, एतत् सर्वं विश्वं चराचरभूतं जगत् शून्यभूतं¹शून्यातिशून्यतामाप्तं न किञ्चित्, गन्धर्वनगरादितुल्यमध्यासात्मकमसदित्याद्याख्यं नामरूपादिहीनं मायागहनं च विचिन्तयेत् विभावयेत् । तत्रैव च मनः स्वात्मनश्चित्तं लीनं कुर्यात् । तत एवं करणेन तल्लयभाजनं तत्र लयस्तन्मयीभावस्तस्य भाजनं पात्रं जायते। साधकः स्वप्रकाशात्मस्वरूपो भवतीति भावः ॥५७॥ हे महादेवि, साधक को ऐसा विचार करना चाहिये कि यह सारा चराचर जगत् शून्यभूत है, अर्थात् कुछ भी नहीं है। यह गन्धर्वनगर के तुल्य अध्यासात्मक, कल्पना प्रसूत, अत एव असत् है। यह नाम और रूप आदि से रहित मायाकलित है। इसी के साथ अपने मन को भी इसी भावना में लीन कर देना चाहिये। ऐसा करने से वह साधक लय का भाजन

  1. शून्यातिशून्य पद की व्याख्या पृ० ४८ की टिप्पणी में देखनी चाहिये । प्रस्तुत प्रकरण में इस शब्द का प्रयोग अत्यन्त असत् अर्थ में किया गया है। ५८वें श्लोक की व्याख्या में शून्या- तिशून्य शब्द का प्रयोग पूर्वोक्त अर्थ में हुआ है।