विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४ : विज्ञानभैरव हो जाता है, अर्थात् उक्त भावना के अभ्यास से यह जो स्वप्रकाशात्मक सत्तत्त्व उसके अपने स्वरूप में अभिव्यक्त हो गया है, उसी में उसका पूर्व-कल्पित रूप विलीन हो जाता है। तब साधक का स्वरूप में तन्मयीभाव हो जाता है ॥५७॥ [ धारणा-३५ ] घटादिभाजने दृष्टिं भित्तीस्त्यक्त्वा विनिक्षिपेत् । तल्ल्यं तत्क्षणाद् गत्वा तल्लयात्तन्मयो भवेत् ॥५८॥ घटादिभाजनेऽन्तःसुषिरे घटादिवस्तुनि भित्तीस्त्यक्त्वा दक्षिणोत्तरपार्श्वादि विहाय दृष्टिं विनिक्षिपेत् । धारणायाऽनया साधकस्तत्क्षणात् तस्मिन्नाकाशे लयं गत्वा तस्याकाशस्यापि लयात् परमशून्यातिशून्ये विश्रान्तेस्तन्मयो भवेत् परब्रह्मसमा- विष्टः सन् ब्रह्मैव सम्पद्यते ॥५८॥ भीतर से पोले (खाली) घट आदि पदार्थों में अगल-बगल की दीवारों को छोड़कर अपनी दृष्टि को सीधे उस पात्र के भीतर स्थित शून्यता में लगावे। घट प्रभृति के भीतर का आकाश विभिन्न आकारों में विभक्त हो जाता है। आकाश की इन विभाजक दीवारों की उपेक्षा कर योगी यह भावना करे कि घट आदि पात्रों के भीतर के आकाश को इस अनन्त शून्य से दीवारें अलग नहीं कर सकतीं। इस तरह से घट स्थित आकाश में साधक का चित्त जब विश्राम-लाभ कर लेता है, तो उसको शून्यातिशून्य में मेरा मन विलीन हो गया है, ऐसी भावना करनी चाहिये। इससे साधक परब्रह्मभाव में समाविष्ट हो जाता है, स्वयं ब्रह्म बन जाता है ॥५८॥ [ धारणा-३६ ] १निर्वृक्षगिरिभित्त्या१दिदेशे दृष्टिं विनिक्षिपेत् । २विलीने मानसे भावे वृत्तिक्षीणः प्रजायते ॥५९॥ निर्वृक्षगिरिभित्त्यादिदेशे निर्वृक्षदेशे मरुस्थलादौ शून्यदिगादौ वा, गिरौ पर्वतादौ तुङ्गादिविषयादौ, भित्त्यादिदेशे च दृष्टिं विनिक्षिपेत् दृङ्निक्षेपं कुर्यात् । भावनयाऽनया मानसे भावे चित्तस्वरूपे तत्तदालम्बनाभावाद् विलीने गलिते सति योगी वृत्तिक्षीणः क्षीणसमस्तवृत्तिः प्रजायते महाप्रकाशस्वरूपो भवति, ब्रह्मैव संपद्यत इत्यर्थः ॥५९॥ वृक्षरहित प्रदेश मरुभूमि में अथवा शून्य दिशाओं में, पर्वत के शिखर अथवा किसी भी ऊँचे स्थान में और भित्ति (दीवाल) आदि प्रदेशों में अपनी दृष्टि को जमाने का, स्थिर करने १. °दौ-प० । २. नि°-ने० ।
- ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० २, पृ० ३११) में 'निर्वृक्षगिरिभित्त्यादि' इतना अंश और (पृ० ४२७) में तथा परार्त्रिशिका (पृ० १३६) में प्रथम पंक्ति मिलती है। नेत्रतन्त्रो- द्योत (भा० १, पृ० २००) में पूरा श्लोक मिलता है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)