भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ६५ का, अभ्यास करे। इस भावना के अभ्यास से साधक की दृष्टि में शून्यता समाने लगती है। ऐसी अवस्था में आलम्बन के अभाव में मानस भाव, अर्थात् चित्त के स्वरूप के विगलित हो जाने पर योगी की समस्त वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं और उसमें महाप्रकाश का आविर्भाव ह जाता है, अर्थात् वह स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। "बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः" (यो० सू० ३।४३) इस सूत्र में वर्णित चित्त की स्थिति को 'महाविदेहा' नाम दिया है, जिसमें कि सब तरह के आवरणों का क्षय हो जाता है और प्रकाशात्मक स्वरूप आलोकित हो उठता है। अभिनवगुप्त ने परा-त्रिशिका की व्याख्या (पृ० १३६) में तथा ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० ३, पृ० ३११ एवं ४२७) में इस श्लोक के पूर्वार्ध को उद्धृत कर साधक के भैरव-बोध में अनुप्रवेश की बात को अच्छी तरह से समझाया है ॥५९॥ [ धारणा-३७ ] 1उभयोर्भावयोर्ज्ञानं ज्ञात्वा2 मध्यं समाश्रयेत् । युगपच्च द्वयं त्यक्त्वा मध्ये तत्त्वं प्रकाशते ॥६०॥ उभयोर्भावयोर्ज्ञानि भावद्वयस्य प्रतीतिक्राले मध्यमन्तरालं तद्भावद्वयावच्छेदहेतुं शून्यं ध्यात्वा उपलभ्य तं समाश्रयेत् सम्यग् एकाग्र्येण आश्रयेत् । तत एव च तद्भावद्वयं युगपत् त्यक्त्वा अनालोचनेन परिहृत्य योगिनस्तत्र मध्ये तत्त्वं परं धाम व्यज्यते । अयं भावः—घटोऽयं पटोऽयं तटोऽयमित्यादिनानात्वेन वेद्यराशिपतितस्य सारं विज्ञाय तन्मध्ये च अत्र कश्चिद् वेदकोऽस्तीति ज्ञातृत्वावगमं कृत्वा तेन च ज्ञातृ-ज्ञान-ज्ञेयादिनानात्वेन अनानात्वं विधाय विभागकल्पनात्यागाद् एकाग्र्यमेव प्रमातृतत्त्वाख्यं निर्विकल्पदशामयं “तत्त्वमसि” (छा० ६।८।७) इत्यादिवाक्यसमुत्पन्नमासाद्य परं धाम प्रविशति ॥६०॥ दो भावों की प्रतीति के समय में इन दोनों के मध्य में स्थित शून्य को ध्यान के द्वारा पकड़ कर उसमें चित्त को एकाग्रता के अभ्यास द्वारा स्थिर कर दे। इसके स्थिर हो जाने पर एक साथ उक्त दोनों भावों का 2अनालोचनात्मक पद्धति से परित्याग कर दे। इस भावना के १. °नं-ई० । २. ज्ञात्वा-ख० ने० तवि० ई० ।

  1. नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २०१) तथा तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १२७ में यह उपलब्ध है। ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० ३, पृ० ३४६) में 'उभयो- र्भावयो र्ज्ञानं ज्ञात्वा मध्यम्' केवल इतना अंश मिलता है।
  2. "शब्दादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्तिः" (श्लो० २८) सांख्यकारिका की इस कारिका में श्रोत्र प्रभृति पांचों बुद्धीन्द्रियों का प्रथम व्यापार आलोचनात्मक माना गया है, अर्थात् इन इन्द्रियों से पहले अपने-अपने विषयों का निर्विकल्पात्मक प्रत्यक्ष होता है। "अस्ति ह्यालोचनज्ञानं प्रथमं निर्विकल्पकम्" भट्ट कुमारिल के श्लोकवार्तिक के इन श्लोकों में भी, जिनको कि सांख्यतत्त्वकौमुदी में वाचस्पति मिश्र ने २७वीं कारिका की व्यख्या में उद्धृत किया है, इस निर्विकल्पक प्रत्यक्ष और उसके बाद होने वाले सविकल्पक