विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६६ : विज्ञानभैरव अभ्यास से भावनिर्मुक्त शून्य में चित्त के लीन हो जाने के कारण उसमें परम तत्त्व की अभिव्यक्ति हो जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि यह घट है, यह पट है, यह तट है, इत्यादि नाना प्रकार की प्रतीतियों के आधार पर वेद्य (ज्ञेय) रूप में भासित हो रही वस्तुओं के सार को समझ कर कि इन सब के मध्य में ज्ञाता के रूप में विद्यमान तत्त्व एक ही है और इसी से ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय के ये नाना प्रकार (भेद) केवल कल्पना से प्रसूत हैं, वस्तुतः यह सब एक ही तत्त्व का विस्तार है, योगी नानात्व का परिहार करके, अर्थात् विभाग (भेद) कल्पना का परित्याग करके चित्त को एकाग्र करने का अभ्यास करता है। बाद में इस भावना में चित्त के स्थिर हो जाने पर यह सब प्रमाता (ज्ञाता) के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, इस तरह से निर्विकल्प दशा का सहारा लेकर साधक "तत्त्वमसि" (छा० ६।८।७) इत्यादि उपनिषद् वाक्यों में उपदिष्ट पद्धति से अपने (प्रमाता के) वास्तविक स्वरूप को जान लेता है। यह स्थिति ही परम धाम में प्रवेश के नाम से यहाँ वर्णित है। पहले २५-२६ संख्या के श्लोकों में ^1प्राण और अपान की मध्य-दशा का विकास कर उसमें चित्त को स्थिर करने की भावना का उपदेश किया गया है। यहाँ दो भावों के मध्य में मध्य-दशा के विकास की बात वर्णित है। "प्राणापानमयः" (३।२।१९) इस ईश्वरप्रत्यभिज्ञा- कारिका की विवृतिविमर्शिनी (भा० ३, पृ० ३४६) में अभिनवगुप्त ने "एकचिन्ताप्रसक्तस्य" (४१ श्लो०) इस स्पन्दकारिका के श्लोक के साथ विज्ञानभैरव के प्रस्तुत श्लोक को भी उद्धृत कर इस स्वात्मविश्रान्ति दशा का विश्लेषण किया है। नेत्रतन्त्र के "नोर्ध्वं ध्यानं प्रयुञ्जीत" (८।४१-४३) इत्यादि श्लोकों की व्याख्या करते हुए क्षेमराज ने तो निरालम्ब भावना के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत श्लोकों को उद्धृत कर "अकिञ्चिच्चिन्तकस्य" (मा० २।२३) इत्यादि वचनों के आधार पर इस भावना के परित्याग की ही बात कही है। इसका अभि- प्राय यही है कि शाम्भव उपाय के अवलम्बन की सामर्थ्य प्राप्त हो जाने पर फिर आणव उपाय का सहारा न लिया जाय ॥६०॥ [ धारणा ३८ ] ^२भावे 'न्यक्ते निरुद्धा चिन्नैव भावान्तरं व्रजेत् । तदा तन्मध्यभावेन विकसत्यति भावना ॥६१॥ १. त्य°-ख० स्प० ने० ई० तवि० । प्रत्यक्ष का विवेचन मिलता है। प्रकृत धारणा में इन्द्रियों के इस आलोचनात्मक व्यापार में प्रवृत्त होने वाली वृत्तियों का निरोध कर लिया जाता है, भैरवी मुद्रा के सहारे विषयों को देखते हुए भी अनदेखा कर दिया जाता है और इस तरह से अनालोचनात्मक पद्धति से भावों का परित्याग हो जाता है।
- प्राण और अपान के संबन्ध में पृ० २९-३० पर दी गई टिप्पणी देखनी चाहिये । इस विषय पर अनेक प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर उपोद्घात में विचार किया जायेगा ।
- स्पन्दनिर्णय (पृ० ६२), नेत्रतन्त्रोद्योत (भा० १, पृ० २०१), ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृति-