विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ६७ न्यक्तेऽन्तर्हितेऽदृष्टे, भावे पदार्थे त्रिनेत्रचतुर्भुजाकारे ध्येयवस्तुनि, चित् चेतना, निरुद्धा अभ्यासपाटवेन नितरां रुद्धा स्थापिता सती, भावान्तरम् अन्यपदार्थं दृष्टदेह- घटादिकं नैव व्रजेत् । 'भावेऽव्यक्ते' इति पाठे तु अकारप्रश्लेषेणापि 'अव्यक्ते' इति पूर्वोक्त एवार्थः । 'भावेऽत्यक्ते' इति चाप्यकारप्रश्लेषण अत्यक्ते स्वीकृते इत्यर्थः । तदा तयोः व्यक्ताव्यक्तभावयोः, मध्यभावेन न किञ्चिद्रूपमध्यधामविश्रान्तया, भावना मध्य- दशाविश्रान्तिसंस्कारः, अति अतिशयेन, विकसति उद्बोधमायाति । अद्भुतफुल्ल- न्यायेन¹ मनश्चातिविकासत्वं यायात्, ब्रह्मैव संपद्यत इति भावः ॥६१॥ न्यक्त अर्थात् अन्तर्हित = अदृष्ट (कभी नहीं देखे गये) तीन नेत्र, चार भुजा आदि से युक्त शंकर, विष्णु आदि इष्ट ध्येय पदार्थों में चेतना को अभ्यास के सहारे स्थापित कर लेने पर वह पहले देखे गये शरीर, घट, पट आदि बाह्य पदार्थों की ओर आकृष्ट नहीं होती । यहाँ न्यक्त यह छान्दस प्रयोग है । वेदभाष्यकारों ने ²न्यक्त का अर्थ बुडित (डूबा हुआ), तिरोहित या अन्तर्हित किया है । 'भावे न्यक्ते' के स्थान पर 'भावेव्यक्ते' अथवा 'भावेत्यक्ते' ऐसे पाठ भी मिलते हैं। यहाँ सन्धि के नियमों के अनुसार 'भावेऽव्यक्ते' तथा 'भावेऽत्यक्ते' इस तरह से अकार का प्रश्लेष³ मानना चाहिये । इस तरह से अव्यक्त का अर्थ अदृष्ट और अत्यक्त का अर्थ स्वीकृत होगा, अर्थात् किसी अदृष्ट भाव में, इष्टदेव के रूप में स्वीकृत भाव में, चेतना को लगा देने पर वह फिर किसी दूसरे भाव की तरफ उन्मुख नहीं होती । योगशास्त्र में इसी स्थिति को 'समाधि' कहा गया है— विमर्शिनी (भा० ३, पृ० ३४६), तन्त्रालोकविवेक (भा० १, आ० १, पृ० १२७; भा० ११, आ० २९, पृ० ८५) में यह उद्धृत है । ई० वि० वि० में केवल प्रथम चरण ही मिलता है ।
- कमल, गुलाब आदि के खिले हुए फूल को देखकर हमारे मन की कली खिल उठती है । उसी तरह से किसी भी अनोखी वस्तु को देख कर हमारे मन की यही स्थिति होती है । अद्भुतफुल्ल न्याय से इसी स्थिति की ओर इंगित किया गया है । "कुहनेन प्रयोगेण" (श्लो० ६५) इस श्लोक में भी इसी तरह की स्थिति में धारणा को केन्द्रित करने की बात कही गई है ।
- वैदिक पदानुक्रमकोश की सहायता से ज्ञात होता है कि न्यक्त पद तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण आदि में आया है । उक्त स्थलों के मुद्रित भाष्यों में कहीं भी ऐसा अर्थ नहीं मिला । इसी से मिलता-जुलता अर्थ अवश्य मिलता है । जैसे कि—"न्यक्तं निमग्नं विस्मृतम्" (तै० सं० १।५।२।४ पर सायण का भाष्य) ।
- सन्धि के नियमों के अनुसार जब अकार या आकार पूर्व पद के साथ प्रश्लिष्ट हो जाता है, जुड़ जाता है, तो ऐसे स्थलों पर उनके लोप को दिखाने के लिये क्रमशः ऽ ऽऽ इस तरह के अवग्रह चिह्न लगाये जाते हैं । इन चिह्नों को देख कर सरलता से जाना जा सकता है कि यहाँ अकार या आकार प्रश्लिष्ट है ।