भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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उपोद्घात

श्रद्धेय गुरुचरण श्रीगोपीनाथ कविराजजी को योगशास्त्र के तीन ग्रन्थ परम प्रिय थे । ये हैं—पातंजल योगसूत्र का व्यास-भाष्य, विज्ञानभैरव और विरूपाक्षपंचाशिका¹ । उनके यहाँ इन ग्रन्थों का बार-बार पाठ होता था । इन ग्रन्थों में से व्यास-भाष्य के अनेक संस्करण और अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं । योगशास्त्र के पाठकों के समक्ष आज यह विज्ञानभैरव का संस्करण अन्वयार्था नाम की संक्षिप्त संकलित संस्कृत व्याख्या और रहस्यार्था नाम की विस्तृत हिन्दी टीका के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है । अभिनवगुप्त ने इस ग्रन्थ को ²आगम, ³शिव- विज्ञानोपनिषद् और ⁴रुद्रयामलसार के नाम से उद्धृत किया है । अभिनवगुप्त रचित परमार्थ- सार के टीकाकार ⁵योगराज ने इसको शैवोपनिषद् कह कर उद्धृत किया है । ⁶अमृतानन्द योगी इसको विज्ञानभैरवभट्टारक और ⁷महेश्वरानन्द विज्ञानभट्टारक के नाम से स्मरण करते हैं। अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ, स्पन्दप्रदीपिकाकार उत्पल वैष्णव, अभिनवगुप्त के प्रमुख शिष्य स्वच्छन्दतन्त्र, नेत्रतन्त्र प्रभृति ग्रन्थों के टीकाकार क्षेमराज प्रभृति विद्वानों ने बड़े आदर १. विद्याचक्रवर्ती कृत विवृति के साथ यह ग्रन्थ पहले (ई० १९१० में) त्रिवेन्द्रम् संस्कृत ग्रन्थमाला में प्रकाशित हुआ था, जो कि अब उपलब्ध नहीं होता । इस ग्रन्थ पर अत्यन्त अनुराग होने के कारण ही श्रद्धेय कविराजजी ने तन्त्रसंग्रह के प्रथम भाग के प्रथम ग्रन्थ के रूप में इसको पुनः प्रकाशित कराके सुलभ बना दिया है । यह ध्यान देने की बात है कि शिवपुराण की छठी कैलाससंहिता (१९।४४) में यह ग्रन्थ उद्धृत है । २. ई० प्र० वि० वि०, भा० १, पृ० २८७; भा० २, पृ० २१४, ४२७ । ३. वहीं, भा० २, पृ० ४०५ । ४. वहीं, भा० ३, पृ० २८५; इस ग्रन्थ के प्रथम श्लोक में 'रुद्रयामल' शब्द आया है और ग्रन्थ के अन्त में १६०वें श्लोक में देवी कहती है कि आज मैंने रुद्रयामल तन्त्र के सार को समझ लिया है । इसीलिये इस ग्रन्थ को 'रुद्रयामलसार' नाम दे दिया गया, ऐसा प्रतीत होता है । परात्रिंशिका के अन्त में भी रुद्रयामल शब्द आया है । रुद्रयामल तन्त्र का नाम नित्याषोडशिकार्णव (४।५९) में स्पष्ट उल्लिखित है । टीकाकारों के अनुसार १।१५ और ४।६२ में भी इसी ग्रन्थ का उल्लेख है । यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्राचीन तान्त्रिक ग्रन्थ है । प्राचीन मातृकाओं के आधार पर इसके समालोचनात्मक संस्करण की अत्यन्त आवश्यकता है । तभी परात्रिंशिका, विज्ञानभैरव, नित्याषोडशिकार्णव प्रभृति ग्रन्थों के साथ इस ग्रन्थ का तुलनात्मक अनुशीलन किया जा सकता है । ५. परमार्थसारटीका, योगराज कृत, पृ० १४८, १५१ । ६. योगिनीहृदयदीपिका में अनेक स्थलों पर । ७. महार्थमंजरी की परिमल व्याख्या में अनेक स्थलों पर । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)