भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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( २ ) के साथ प्रमाण के रूप में इसको उद्धृत किया है। इस प्रकार यह ग्रन्थ योगशास्त्र एवं आगमशास्त्र का एक उज्ज्वल रत्न है। इसकी प्रतिपाद्य विषयवस्तु का संक्षिप्त परिचय प्रथम श्लोक की व्याख्या में तन्त्रावतार शीर्षक के अन्तर्गत (पृ० ६-७) दिया गया है। यहाँ सर्वप्रथम प्रस्तुत संस्करण के सम्बन्ध में कुछ कह देना आवश्यक है। प्रस्तुत संस्करण काश्मीर ग्रन्थमाला के ८-९ ग्रन्थांक के रूप में दो टीकाओं के साथ इस ग्रन्थ का प्रकाशन संवत् १९७५ में श्रीनगर से हुआ था। इनमें से प्रथम टीका (विवृति) शिवोपाध्याय की और दूसरी (विज्ञानकौमुदी) भट्ट आनन्द की है। क्षेमराज ने भी विज्ञानोद्योत नाम की व्याख्या इस पर लिखी थी। महेश्वरानन्द ने महार्थमंजरी की स्वोपज्ञ परिमल टीका (पृ० १४६-१४७) में इसका उल्लेख किया है, किन्तु आज यह उपलब्ध नहीं होती। शिवोपाध्याय की विवृति के १अन्तिम श्लोकों (पृ० १४३) से मालूम होता है कि उनके समय में १ से २४ श्लोक तक की ही क्षेमराज की व्याख्या उपलब्ध थी। इससे आगे के ग्रन्थ की कागज या भूर्जपत्र पर लिखी हुई कोई पुस्तक उनको नहीं मिली। कालरूपी घुन ने उसको चाट लिया अथवा वह अग्नि को समर्पित कर दी गई, इस बात को तो भगवान् ही जानते हैं। विज्ञानो- द्योत के इस उपलब्ध अंश को शिवोपाध्याय की व्याख्या में सम्मिलित कर लिया गया है और उक्त संस्करण के पृ० १६ पर लिखा गया है कि अब इसके आगे शिवोपाध्याय की विवृति आरम्भ होती है। वस्तुतः इस वाक्य को प० २१ पर होना चाहिये था, जहाँ से कि २५वें श्लोक की व्याख्या प्रारम्भ होती है, क्योंकि शिवोपाध्याय के ही कथन के अनुसार 'ऊर्ध्वे प्राणः' इस चौबीसवें श्लोक तक की व्याख्या क्षेमराज की कृति है। इस तरह से श्रीनगर संस्करण में इस ग्रन्थ की तीन टीकाओं का समावेश है।२ क्षेमराज ने स्पन्दनिर्णय प्रभृति ग्रन्थों में विज्ञानभैरव के श्लोकों को उद्धृत कर उनकी व्याख्या की है। शिवोपाध्याय की व्याख्या में उन अंशों का भी उचित समावेश मिलता है। इससे ऐसी प्रतीति होने लगती है कि शिवोपाध्याय के समय में भी विज्ञानोद्योत विद्यमान था। हमने अपने संस्करण को प्रस्तुत करने में मुख्य सहायता इसी संस्करण से ली है। खेद है कि भाषा की अनभिज्ञता के कारण हम इस ग्रन्थ के फ्रेंच संस्करण से कोई सहायता न ले सके। जैसा कि पहले कहा गया है विज्ञानभैरव के श्लोक प्रमाण के रूप में अनेक ग्रन्थों १. श्रुतं देव मयेत्यादिप्रश्नग्रन्थार्थबन्धनम् । ऊर्ध्वे प्राणादिपञ्चान्तं क्षेमराजकृतं शुभम् ॥ ततः परमुपाध्यायकुशकाशावलम्बनम् । यद्वृत्तिग्रन्थकाकपुस्तकं हस्तगोचरम् ॥ भूर्जात्मकं वा नायातं जग्धं कालघुणेन तत् । दग्धं वा वह्निना च्छिन्नमत्र साक्षी महेश्वरः ॥ २. विमर्शदीपिका के सम्बन्ध में आगे पृ० ३१ की १ टिप्पणी देखिये ।

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