विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ६९ आपादात् केशान्तं सर्वं देहं जगद् वा सर्वं चिन्मयं प्रत्यंशं चिदेकरूपं युगपत् अक्रमं निर्विकल्पेन मनसा स्फुरच्चिच्चमत्कारव्याप्त्या परिभावयेत् परितः अन्तर्बहिश्च भावयेत् । अनया धारण्या "प्रकाशमानं न पृथक् प्रकाशात्"¹ इति न्यायेन परमोदयो भवति, प्रकाशः प्रकाशात इति भावः । 'मनसः परमा गतिः' इति पाठे मनस उत्कर्षरूपा परमा गतिर्भवतीत्यर्थः ॥६२॥ पैर से लगाकर चोटी तक अपने पूरे देह की, इसके प्रत्येक अंश की, अथवा इस सारे जगत् की एक साथ अक्रम रूप से चिन्मय स्वरूप में भावना करे । इस तरह की भावना से मन के निर्विकल्प हो जाने से भीतर और बाहर चित् के चमत्कार की अभिव्यक्ति हो जाने पर सब तरफ केवल प्रकाश ही प्रकाश बच रहता है, अर्थात् "प्रकाशमान वस्तु, शरीर या जगत्, प्रकाश स्वभाव परमतत्त्व से भिन्न नहीं है" इस न्याय के अनुसार मन की निर्विकल्प दशा में सभी वस्तुओं के प्रकाश रूप में परिणत हो जाने पर योगी की परमोदय अवस्था अभिव्यक्त हो जाती है । 'मनसः परमा गतिः' इस पाठ में इसका अर्थ होगा कि मन की गति उत्कर्ष की ओर बढ़ जाती है । क्षेमराज ने "शुद्धतत्त्वानुसंधानाद्वाऽपशुशक्तिः" (१।१६) इस शिवसूत्र की व्याख्या करते हुए विज्ञानभैरव के इस श्लोक के साथ स्पन्दकारिका के— इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । संपश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ इस श्लोक को भी उद्धृत किया है । स्वच्छन्दतन्त्र के 'तत्त्वाध्वधर्मनिर्मुक्तः....'सर्वं शिवमयं स्मरेत्" (७।२४२-२४४) इत्यादि श्लोकों में भी यही विषय प्रतिपादित है ॥६२॥ [ धारणा- ४०] ²सर्वं जगत् स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् । युगपत् स्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ॥६३॥ सर्वं जगत् स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं त्यक्तविषयानन्देन स्वकीयेनानन्देन भरितं स्वकीयचिदानन्दपूर्णं स्मरेत् चिन्तयेत् । भावनयाऽनया भावको युगपत् सहसा स्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ! "आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीव- न्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति" (तै० उ० ३।६) इति दृष्ट्या कृतकृत्यो भवेदिति भावः । "इह आश्यानचिद्रसरूपस्य जगतोऽपि भासनात् "सर्वं देहं चिन्मयं हि" (श्लो० ६२) इति पूर्वस्याः प्रकाशधारणायाः सकाशाद् विशेषः" इति शिवोपाध्यायः । वस्तुतस्तु पूर्वं चिन्मयो, अत्र चानन्दमयी धारणा प्रदर्शिता ॥६३॥ १. शिवोपाध्यायेन पूर्वं 'वायुद्वयस्य' ततश्च 'सर्वं जगत्' इति श्लोको व्याख्यातः ।
- पूरा श्लोक 'ज्ञानप्रकाशकं सर्वं' (१३४) की व्याख्या में उद्धृत है। वहीं इसका अर्थ भी किया गया है । २. शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० १८, ६४) और महार्थमंजरीपरिमल (पृ० ११२) में यह श्लोक उद्धृत है ।