भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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७० : विज्ञानभैरव इस सारे जगत् में अथवा अपने शरीर में, बाहरी विषयों के आनन्द से अलग अपने भीतरी स्वाभाविक आनन्द से यह सब परिपूर्ण है, इस तरह की भावना करे । इस भावना के अभ्यास से योगी सहसा उस अमृतमय स्वाभाविक आनन्दमय अवस्था में प्रविष्ट हो जाता है, जिसका कि वर्णन उपनिषदों में मिलता है । तैत्तिरीय उपनिषद् में बताया गया है कि आनन्द से ही ये सब भूत (पदार्थ) उत्पन्न होते हैं, उसी की सहायता से पैदा होकर जीते हैं और प्रलय की अवस्था में उसी में लीन हो जाते हैं । इस स्थिति को पा लेने पर योगी कृतकृत्य हो जाता है । प्रस्तुत भावना में चिद्रस की आश्यान (घन=जमी हुई) अवस्था के रूप में जगत् का भी आभास होता रहता है, अतः यही पूर्व धारणा से इस धारणा की विशेषता है, ऐसा शिवोपाध्याय कहते हैं । वस्तुतः पूर्व श्लोक में चिन्मयी और इसमें आनन्दमयी धारणा वर्णित है । अतः स्पष्ट ही ये दोनों धारणाएं एक दूसरे से भिन्न हैं । "लोकानन्दः समाधिसुखम्" (१।१८) और "चित्तस्थितिवच्छरीरकरणबाह्येषु" (३।३९) इन दोनों शिवसूत्रों की व्याख्या करते हुए क्षेमराज ने प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत किया है । महेश्वरानन्द ने "शोषो मलस्य नाशो०" (श्लोक ४४) इत्यादि पूर्व उद्धृत गाथा में प्राणा- याम के प्रसंग में 'आप्लावन' शब्द की व्याख्या करते समय इस श्लोक का उदाहरण दिया है ॥६३॥ [ धारणा-४१ ] वायुद्वयस्य संघट्टादन्तर्वा बहिरन्ततः । योगी समत्वविज्ञानसमुद्गमनभाजनम् ॥६४॥ अन्तः हृदये, बहिः द्वादशान्ते, वा च, वाशब्दोऽत्र चकारार्थः । वायुद्वयस्य प्राणा- पानरूपस्य संघट्टात् योजनात् । अन्ततः प्रवेशनिर्गमयोः पर्यवसाने प्राणापानसंघट्टमनु- ल्लिखितभेदं निर्गमप्रवेशविनाकृतं शून्यकल्पं ध्यात्वा योगी प्रबुद्धः समत्वविज्ञानेन संमदृष्ट्या समुद्गमनभाजनं रहस्यस्थानपर्यवसायिप्राणापानादिगोचरः स्यात् । परम- सिद्धिभाग् भवेदिति भावः ॥६४॥ आन्तर स्थान हृदय और बाह्य स्थान द्वादशान्त में प्राण और अपान रूप दो वायुओं के संघट्ट से, अर्थात् इनकी हृदय और द्वादशान्त में अन्तः प्रवेश और बहिः (बाहर) निर्गमन काल की समाप्ति हो जाने पर, अन्ततः उस शून्यकल्प अवस्था का ध्यान करने पर, जिसमें कि प्राण और अपान के संघट्ट की अलग से प्रतीति नहीं हो पाती, योगी ^1प्रबुद्ध हो जाता है, उसमें समत्व दृष्टि का विकास हो जाता है । योगी में सर्वत्र समत्व बोध का उदय होने से सर्वत्र समान (एक सी) दृष्टि रखने से वह प्राण और अपान की भेद-स्थिति की जिस रहस्यमय स्थान में समाप्ति हो जाती है, उस साम्यावस्था को तो वह जान ही लेता है, साथ ही जागतिक सभी पदार्थों को भी वह इसी तरह से उस रहस्यात्मक परमतत्त्व में विलीन कर लेता है, अर्थात्

  1. प्रबुद्ध प्रभृति शब्दों के विषय में १२८वें श्लोक की अन्तिम टिप्पणी द्रष्टव्य । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)