भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128

विज्ञानभैरव : ७१ अपने से अभिन्न रूप से देखने लगता है और इस समता-दृष्टि के विकसित होने से वह परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। तन्त्रालोक के— समता सर्वदेवानामोवल्लीमन्त्रवर्णयोः । आगमानां गतीनां च सर्वं शिवमयं यतः ॥ (४।२७४-२७५) इस श्लोक की व्याख्या करते हुए जयरथ ने तथा महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १६८) में महेश्वरानन्द ने समता-दृष्टि के बोधक त्रिकशासन के निम्न दो श्लोकों को उद्धृत किया है— समता सर्वभावानां वृत्तीनां चैव सर्वशः । समता सर्वदृष्टीनां द्रव्याणां चैव सर्वशः ॥ भूमिकानां च सर्वासामोवल्लीनां तथैव च । समता सर्वदेवानां वर्णानां चैव सर्वशः ॥ अर्थात् जगत् के सभी भावों, वृत्तियों, दृष्टियों, द्रव्यों, भूमिकाओं, ओवल्लियों, देवताओं और वर्णों में सब तरह से एक सी दृष्टि रखना ही समता दृष्टि कहलाती है। तन्त्रालोककार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सब कुछ शिवमयं है, अतः इस समता-दृष्टि का उदय हो, यह स्वाभाविक है। ऊपर की भावना के अभ्यास से इसी समता-दृष्टि का विकास होता है ॥६४॥ [ धारणा-४२ ] १कुहनेन प्रयोगेण सद्य एव मृगेक्षणे । समुदेति महानन्दो येन तत्त्वं २प्रकाशते ॥६५॥ हे मृगक्षणे, कुहनप्रयोगः विस्मापकाद्भुतमायादिप्रयोगः, ऐन्द्रजालिकरचितमायी- योद्यान-तत्स्थितचित्रकुसुमवृक्षादितत्स्थस्वात्मविहरण-स्वाङ्गच्छेदन-पुनस्तत्संयोजनादि- -अतिविस्मयजनकप्रयोगस्तेन कुहनेन प्रयोगेण सद्य एव विस्मयभरितो महानन्दः समु- देति, तथैवेदृशान् कुहनप्रयोगान् भावयतो योगिनस्तत्क्षणं परमानन्दोदयस्वरूपा निर्वि- कल्पावस्था समुदेति, येन तत्त्वं परमभैरवस्वरूपं प्रकाशतेऽभिव्यक्तीभवति ॥६५॥ हे मृगनयनि, कुहन प्रयोग (जादू का खेल) मनुष्य के मन में तत्काल विस्मय पैदा करता है। जादूगर जब अपने जादू से जादुई बगीचा बनाता है, उसमें विचित्र फल-फूलों से लदे वृक्ष दिखाई देने लगते हैं; उस बगीचे में वह बिहार करता दिखाई पड़ता है, बाद में दिखाई पड़ता है कि उसके हाथ-पैर आदि अंग कट-कट कर गिर रहे हैं, फिर दिखाई पड़ता है कि वे पुनः आपस में जुड़ गये हैं। इन सब आश्चर्यजनक कार्यों को देखकर देखनेवाले का मन उस समय कुछ क्षण के लिये अद्भुत आनन्द से सराबोर हो जाता है। इसी तरह की अद्भुत आनन्द से परिपूर्ण मिथ्या परिस्थितियों पर अपनी भावना को केन्द्रित करने वाले योगी के चित्त में १. विभाव्यते—तवि० । २. तन्त्रालोकविवेक (भा० ३, आ० ५, पृ० ३७९) में यह मिलता है।