भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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७२ : विज्ञानभैरव तत्काल परम आनन्द का उदय होने से वह निर्विकल्प दशा में आरूढ़ हो जाता है, जिससे कि उसका पर भैरव स्वरूप प्रकट होने लगता है। तन्त्रालोक के पूर्वोक्त "शाक्ते क्षोभे०" (५।७१) इत्यादि श्लोक में 'अग्रगोचर' पद की व्याख्या करते हुए जयरथ ने इस श्लोक को उद्धृत किया ॰है ॥६५॥ [ धारणा-४३ ] सर्वस्रोतोनि¹बन्धेन प्राणशक्त्योर्ध्वया शनैः । पिपी²लस्पर्शवेलायां प्रथते परमं सुखम् ॥६६॥ सर्वस्रोतोनिबन्धेन श्रोत्रचक्षुर्नासामुखगुह्योपस्थरन्ध्रनिरोधेन, ऊर्ध्वया प्राणशक्त्या, 1आधाराद् द्वादशान्तं यावदूर्ध्वं क्रमेण वहन्त्या प्राणशक्त्या, द्वादशान्ते आत्मविषया- नुभवसमये, पिपीलस्पर्शवेलायां पिपीलिकाया इव शनैश्चरतः प्राणस्य यः स्पर्शो जन्माग्रादिसकाशान्मूलकन्दादिस्थानस्पर्शास्तद्वेलायाम्, अस्यां हि वेलायां योगिनः परीक्षन्ते—अमुतः स्थानादुत्थाय अद्य अदः स्थानं प्राणः प्राप्त इति, परमं सुखं प्रथते योगिनः परानन्दावाप्तिर्भवति, अन्तर्मुखारामो भवतीत्यर्थः ॥६६॥ श्रोत्र, चक्षु, नासिका, मुख, गुह्य, उपस्थ प्रभृति प्राण और अपान आदि वायुओं के निकलने के मार्गों को रोक देने पर वायु की गति ऊपर उठने लगती है । आधार से लेकर द्वाद- शान्त पर्यन्त क्रमशः धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ रही इस प्राण-शक्ति के द्वादशान्त में प्रविष्ट हो जाने पर स्वात्मस्वरूप का अनुभव होने लगता है । योगशास्त्र की परिभाषा में इसको पिपील- स्पर्शवेला कहा जाता है, जिसमें कि प्राण के ऊपर उठते समय जन्माग्र से लेकर मूल, कन्द प्रभृति स्थानों का स्पर्श होने पर उसी तरह की अनुभूति होती है, जैसी कि देह पर चींटी के चलने से होती है। इसी अवस्था में योगी इसकी परीक्षा कर पाते हैं कि प्राण आज अमुक स्थान से चलकर अमुक स्थान तक उठा । इस स्थिति तक पहुँच जाने पर योगी का चित्त परम आनन्द से भर जाता है और वह इसी अन्तर्मुख वृत्ति में रम जाता है । भगवान् पतंजलि ने योग की इस प्रक्रिया का वर्णन 'श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणा- यामः' और 'बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः' (२।४९-५०) इन दो सूत्रों में किया है। इनका अभिप्राय यह है कि प्राण और अपान वायु के धर्म श्वास और प्रश्वास पुरुष के प्रयत्न के बिना निरन्तर स्वाभाविक रूप से गतिशील बने रहते हैं। पुरुष जब अपने विशेष प्रयत्न से क्रमशः अथवा एकाएक इनकी गति को रोकता है, तो प्राण और अपान की गति की यह अवरोध प्रक्रिया योगशास्त्र में प्राणायाम के नाम से जानी जाती है। यह प्राणायाम पूरक, रेचक और कुम्भक के भेद से तीन तरह का होता है । १. °रोधे° - ख० । २. °लिकास्पर्शमात्रात्-खटो० ।

  1. आधार से द्वादशान्त पर्यन्त स्थानों का वर्णन २८ से ३० संख्या के श्लोकों की व्याख्या के प्रसंग में किया जा चुका है । उपोद्घात में भी इस विषय पर विचार किया जायगा । वहीं जन्माग्र, आधार आदि शब्दों की भी स्पष्ट व्याख्या की जायगी । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)