भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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७८ : विज्ञानभैरव में अभिव्यक्त हुआ यह सुख अपना ही है, यह कहीं अन्यत्र से नहीं आता, स्त्री का सहवास केवल उसकी अभिव्यक्ति करता है। अतः जिस स्त्री के सहवास से इस आनन्द की अभिव्यक्ति होती है, अनुभूति होती है, उसी का ध्यान कर साधक ब्रह्मानन्द दशा मे समाविष्ट हो सकता है। शिवोपाध्याय और आनन्दभट्ट ने इस प्रसंग में दो श्लोक उद्धृत किये हैं— जायया संपरिष्वक्तो न बाह्यं वेद नान्तरम् । निदर्शनं श्रुतिः प्राह मूर्खस्तं मन्यते विधिम् ॥ १न सृष्टिर्जायते लिङ्गान्न भगान्नापि रेतसः । आनन्दोच्छलिता शक्तिः सृजत्यात्मानमात्मना ॥ इसका अभिप्राय यह है कि "तद्यथा प्रियया स्त्रिया संपरिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्" (४।३।२१) इत्यादि बृहदारण्यक श्रुति में उदाहरण के रूप में पत्नी के आलि- गन की बात कही गई है, किन्तु अज्ञ जन इसको विधि मानकर उसी में लिप्त हो जाते हैं। वास्तव में यह सृष्टि न तो लिंग से पैदा होती है, न भग से और न वीर्य से ही। आनन्द से सराबोर यह शक्ति स्वयं अपने आप अपना विस्तार कर लेती है। इसी लिये कुछ व्याख्या- कार इस श्लोक के पूर्वार्ध का यह अर्थ करते हैं— "विश्व के विस्फुरण की शक्ति के समागम से संक्षुब्ध चिच्छक्ति के आवेश से"। उच्च दार्शनिक भूमिका में यही स्थिति मान्य हो सकती है। इस श्लोक को अभिनवगुप्त ने परात्रिंशिका व्याख्या (पृ० ५१) में उद्धृत किया है और तन्त्रालोक (५।७१) की व्याख्या करते हुए जयरथ ने शाक्त क्षोभ के उदाहरण के रूप में। क्षेमराज ने भी "त्रिपदाद्यनुप्राणनम्" (३।३८) इस शिवसूत्र की व्याख्या करते हुए प्रस्तुत श्लोक को याद किया है और बताया है कि— अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वामृशन् । धावन् वा तत्पदं गच्छेद्यत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ (श्लो० २२) स्पन्दकारिका के इस श्लोक में वर्णित स्पन्दावस्था प्रस्तुत धारणा से प्राप्त होने वाली स्थिति से अभिन्न है। शाक्त उपाय की व्याख्या करते हुए महेश्वरानन्द ने भी महार्थमंजरी की परिमल व्याख्या में इस श्लोक को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है। इन सब स्थलों का अवलोकन करने से उक्त अभिप्राय की ही पुष्टि होती है ॥६८॥ १. "न पद्माङ्का न चक्राङ्का न वज्राङ्का यतः प्रजा। लिङ्गाङ्का च भगाङ्का च तस्मान्माहेश्वरी प्रजा ।।" (अनु० १४।२३३) महाभारत के इस श्लोक से तथा इसी अभिप्राय के— "न च चक्राङ्कितं विश्वं न च वज्राङ्कितं क्वचित् । भगलिङ्गाङ्कितं विश्वं तेन शैवमिदं जगत् ।।" किसी शैवतन्त्र के ग्रन्थ में पठित इस वचन से केवल इतना ही प्रतीत होता है कि ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र के अथवा वैष्णव और बौद्ध दर्शनों के प्रतीकों के साथ किसी की उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु शैव और शाक्त प्रतीकों के साथ ही जीव उत्पन्न होते हैं। इस तरह से टीका में उद्धृत वचन से इन वचनों का कोई विरोध नहीं है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)