विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ७९ [धारणा-४६] लेहनामन्थनाकोटैः स्त्रीसुखस्य भरात् स्मृतेः । शक्त्यभावेऽपि देवेशि भवेदानन्दसंप्लवः ॥६९॥ हे देवेशि, लेहनामन्थनाकोटैः, लेहनं वक्त्रासवास्वादनम्, परिचुम्बनमिति यावत् । मन्थनं प्रधानाङ्गविलोड़नम् आलिङ्गनं वा । आकोटः पुनः पुनर्मर्दनम्, नख- क्षतादि वा। तैस्तैः परिचुम्बनालिङ्गनदन्तक्षतनखक्षतादिभिर्विशेषैः पूर्वानुभूतस्य स्त्रीसुखस्य भरात् स्मृतेः गाढध्यानमात्रात् शक्त्यभावेऽपि स्फुटस्त्र्यादीनां कारणाना- मभावेऽपि आनन्दसंप्लवो भवेत् प्रत्यक्षतयैव सर्वविषयविस्मारक आनन्दोदयः स्यात् । शक्त्यभावेऽपीत्यनेन स्वकीय एव स आनन्दस्तत्संमुखीभावेनायातो न पुनस्तत्र स्त्री कारणमिति स्वयमेवात्मानमानन्दमयं ध्यायेदित्यर्थः । “भरात् स्मर्यमाणो हि स स्पर्शः । तत्स्पर्शक्षेत्रे च मध्यमाकृत्रिमपरात्मकशक्तिनालिकाप्रतिबिम्बित उन्मुक्तशाक्तस्पर्शा- भावेऽपि तदन्तर्वृत्तिशाक्तस्पर्शात्मकवीर्यक्षोभकारी भवतीत्यभिनवगुप्तपादाः” (परा० व्या०, पृ० ५१) ॥६९॥ हे देवेशि, लेहन का अर्थ है अधर-मधु का आस्वादन, अर्थात् परिचुम्बन, मन्थन का अर्थ है प्रधान अंग का विलोडन अथवा आलिंगन, आकोट का अर्थ पुनः पुनः मर्दन अथवा नखक्षत, दन्तक्षत आदि नाना प्रकार के इस तरह के हाव-भावों से उत्पन्न हुए पूर्वानुभूत स्त्रीसुख का प्रयत्नपूर्वक स्मरण करने पर भी व्यक्ति का मन आनन्द से भर उठता है । स्त्री प्रभृति आनन्द के स्पष्ट कारणों की अनुपस्थिति में भी उनको याद करने मात्र से व्यक्ति उनमें डूब जाता है और थोड़ी देर के लिये सब कुछ भूल बैठता है । इससे स्पष्ट होता है कि यह अपना ही आनन्द स्त्री के सहवास से प्रकट होता है । इस आनन्द की अभिव्यक्ति में स्त्री को कारण नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसकी अभिव्यक्ति स्त्री के अभाव में भी स्मृति की सहायता से होती है । अतः यह मानना पड़ेगा कि इस आनन्द की स्थिति अपने स्वरूप में ही है । साधक को चाहिये कि वह इसी स्वाभाविक स्वरूपानन्द की भावना करे और इसकी अभिव्यक्ति के बाह्य उपादानों का परित्याग कर दे । इस भावना के अभ्यास से साधक का चित्त आनन्द से सराबोर हो जाता है । शिवोपाध्याय के अनुसार अभिनवगुप्त ने इस तरह से इस स्थिति को स्पष्ट किया है कि यह स्मर्यमाण स्पर्श उस स्पर्श क्षेत्र में, अकृत्रिम पराशक्ति रूप मध्यम नालिका में, जब प्रतिबिम्बित होता है, तो उस दशा में उन्मुक्त बाह्य शाक्त स्पर्श के अभाव में भी आन्तर शाक्त स्पर्श के कारण वीर्य के क्षोभ का, आनन्दोदय अवस्था की अभिव्यक्ति का, कारण होता है । ध्यान मात्र से सर्वविषय विस्मारक (अन्य सभी विषयों के अनुभव को भुला देने वाले) आनन्द की जो प्रत्यक्ष अनुभूति होती है, उसी को आनन्दोदय दशा कहा जाता है ॥६९॥