भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

८० : विज्ञानभैरव [धारणा-४७] ¹आनन्दे महति प्राप्ते दृष्टे वा बान्धवे¹ चिरात् । आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा त²ल्लयस्तन्मना भवेत् ॥७०॥ आनन्दे महति प्राप्ते, स्फुटेष्टस्त्र्यादिसमागमे सति महान् आनन्दो जायते, एव- मेव दारिद्र्याद्युपद्रुतस्य कस्यचिदनन्तनिष्कण्टककोशप्राप्तेर्महानानन्दो जायते, तस्मिन् प्राप्ते सतीत्यर्थः । वा अथवा । चिराद् बान्धवे दृष्टे चिरकालं प्रवासादागते बान्धवे पुत्रमित्रादौ प्राप्ते सति उद्गतम् उत्पन्नम्, आनन्दं ध्यात्वा उद्गतमात्रमेवानन्दं गृहीत्वा तत्र धारणादार्ढ्येन तल्लयस्तन्मना भवेत्, अन्तर्मनस्कत्वेन परानन्दोदये विश्रान्तः स्यादेवेत्यर्थः ॥७०॥ चिरकाल की प्रतीक्षा के बाद अपनी प्रेमिका का सहवास मिलने पर व्यक्ति के मन में आनन्द का सागर हिलोरे लेने लगता है। परम दरिद्र व्यक्ति को एकाएक अटूट धनराशि मिल जाय तो उसके आनन्द का पूछना ही क्या ! इसी तरह से बड़े लम्बे समय से परदेश गये व्यक्ति के एकाएक घर लौट आने पर उसके परिवार वालों को अपार हर्ष होता है। आनन्द की इसी उत्फुल्ल अवस्था को पकड़ कर उसमें दृढ़ता और आदर पूर्वक निरन्तर धारणा का अभ्यास करने से साधक का चित्त उसी में लीन होकर तदाकार हो जाता है, वह अन्तर्मुख होकर उत्कृष्ट आनन्दोदय दशा में विश्राम प्राप्त कर लेता है। स्पन्दकारिका के “अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा” (श्लो० २२) इस श्लोक में स्पन्दावस्था के नाम से इसी स्थिति को बताया गया है। क्षेमराज और महेश्वरानन्द ने पूर्व श्लोकों की भांति इस श्लोक को भी उसी प्रसंग में उद्धृत किया है और अभिनवगुप्त ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० २, पृ० ५०) में इस स्थिति में परानन्द की अभिव्यक्ति का विश्लेषण किया है ॥७०॥ [ धारणा-४८ ] ²जग्धिपानकृतोल्लासरसा³नन्दविजृम्भणात्⁴ । भावयेद् ⁵भरितावस्थां महानन्दस्ततो⁶ भवेत् ॥७१॥ १. °वेऽचि°-ख० । २. °क्ष्यस्तन्मयो-म०, °न्मनस्तल्लयी°-शि० । ३. °स्वाद°-यो० । ४. °व्यवस्थितेः-ई० । ५. भैरवं भावं-शि० । ६. °मयो-शि० प्र० ।

  1. ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० ५०), शि० वि० (पृ० ६३), महा० परि० (पृ० १४७) और स्पन्दनिर्णय (पृ० ४०-४१) में यह श्लोक मिलता है । प्रथम पुस्तक में केवल प्रथम पंक्ति मिलती है ।
  2. शि० वि० (पृ० ६३), स्तवचिन्तामणिटीका (पृ० ७१), यो० दो० (पृ० १९७, २६५, ३४०) और प्रत्यभिज्ञाहृदय (पृ० ९०) में यह पूरा श्लोक तथा ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० १७९) और स्वच्छन्द० (भा० ६, प० १५, पृ० १२७) में प्रथम पंक्ति मिलती है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)