विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ८१ क्षुदतिशयनिवर्तकयत्किञ्चिन्मात्रभक्ष्यादिभक्षणं जग्धिः, पिपासातिशयनिषेधक- शीतलजलादेर्मधुरक्षीरादेर्वाऽऽस्वादनं पानम्, ताभ्यां प्रतिग्रासं प्रतिसिक्तं प्रतिबिन्दु तुष्टिपुष्टिक्षुत्पिपासानिवृत्त्याख्यकार्यत्रयहेतुभ्यां कृता ये उल्लासरसानन्दाः-करचरणादीनां स्वाङ्गानां स्पर्शनादिविमर्शनेनोच्चैर्द्योतनमुल्लासः, सर्वासु स्थूलसूक्ष्मगर्भनाडीषु शुष्क- ताया अभावे स्नेहार्द्रतालक्षणो रसः, भोजनाद्यभावे हि नाडीनां रूक्षता जायते, तद्भावे तु रसवितननम्, तदनन्तरम् आनन्दः अहंविमर्शसंचेतनम्-तेषां विजृम्भणात् । उल्ल- सद्रसरूपो वा आनन्द उल्लासरसानन्दस्तस्य विजृम्भणात् सर्वगात्रविषयकानुभवविक- सनाद् हेतोः, भरितावस्थां आनन्दपूर्णां स्वदेहदशां भावयेत्, ततो महानन्दो भवेत् । एवं भरितावस्थां भावयत एकाग्रचित्तस्य योगिनः परमानन्दप्राप्तिः स्यादित्यर्थः ॥७१॥ गहरी भूख को मिटाने के लिये जो कुछ खाया जाय, उसको 1'जग्धि' कहते हैं । इसी तरह से गहरी प्यास को मिटाने के लिये पिया गया शीतल जल, मधुर दूध, शर्बत आदि 'पान' कहलाता है । भोजन के प्रत्येक ग्रास और 'पान' की प्रत्येक घूँट से शरीर में सन्तोष, पुष्टि और भूख-प्यास की निवृत्ति ये तीन कार्य अवश्य होते हैं । इनसे शरीर में उल्लास, रस और आनन्द का आविर्भाव होता है। भोजन-पान से संपुष्ट व्यक्ति अपने हाथ-पैर आदि अंगों को छूकर, अपने शरीर के उत्कर्ष को देखकर अनोखी तुष्टि (सन्तोष) का अनुभव करता है, इसी को 'उल्लास' कहा जाता है। भोजन-पान से सभी स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतम नाडियों का सूखापन दूर होकर उनमें स्निग्धता का संचार होता है, इसको 'रस' कहते हैं । भोजन-पान के अभाव में नाडियां रूक्ष हो जाती हैं और भोजन-पान से इनमें रस का संचार होने लगता है । रस का संचार होने से शरीर में एक अनोखे सुख की अनुभूति होती है । यह आनन्द स्वात्मस्वरूप की अनुभूति की याद दिला देता है । इस तरह से भोजन और पान से शरीर की तुष्टि, पुष्टि और भूख प्यास की निवृत्ति होने के उपरान्त आविर्भूत उल्लास, रस और आनन्द शरीर के प्रत्येक अवयव में भर जाते हैं । अथवा—"रसो वै सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति" (तै० उ० २।७) इस श्रुति के अनुसार उत्फुल्ल रस रूपी ब्रह्मानन्द से, हर्षातिरेक से, साधक का सारा शरीर भर जाता है । इस भरितावस्था में, अर्थात् आनन्द से परिपूर्ण स्थिति में पूर्णता दशा की एकाग्रचित्त से भावना करने पर योगी का मन परम आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है । श्रुति प्रतिपादित ब्रह्मानन्द का स्तवचिन्तामणिकार भट्ट नारायण ने इस तरह से वर्णन किया है— त्रैलोक्येऽप्यत्र यो यावानानन्दः कश्चिदीक्ष्यते । स बिन्दुर्यस्य तं वन्दे देवमानन्दसागरम् ॥ (श्लो० ६१) इसकी व्याख्या करते हुए आनन्द की प्राप्ति के उपाय के रूप में क्षेमराज ने प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत किया है । क्षेमराज ने शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ६३) में तथा स्वच्छन्दतन्त्र (भा० ६, प० १२, पृ० १२९) में भी इस श्लोक को उद्धृत किया है और—"योगिनं प्रति बलस्य स्पन्दात्मनः शाक्तवीर्यस्य विवर्धनादुत्तेजनात्" इस तरह से उसकी व्याख्या भी की है ।
- जग्धि और पान का लौकिक अर्थ मांसभक्षण और मदिरापान है ।