भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 256 में से

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८६ : विज्ञानभैरव दिवसे सूर्यकिरणप्रकाशेन, रात्रौ च चन्द्रज्योत्स्नया शबलीभूतमहाकाशसंब- न्ध्यूर्ध्वाधोवर्तिस्थानविशेषे, गृहैकदेशवर्तिदीपप्रकाशव्याप्तप्रकोष्ठाकाशचित्रस्थाने वा अव्यग्रमनस्कतया दृष्टिबन्धमभ्यस्यतः स्वस्वरूपचिदाकाशैकीभावेन स्वात्मस्वरूपाभि- व्यक्तिर्जायते ॥७५॥ दिन में ऊपर-नीचे, सब तरफ बाहरी आकाश के सूर्य की किरणों से प्रकाशित स्थान में, रात्रि में चन्द्रमा की चांदनी से आलोकित उन सभी स्थानों में अथवा घर के एक कोने में रखे हुए दीपक की ज्वाला से प्रकाशित प्रकोष्ठ (कमरा) के चित्रित (चिह्नित) स्थान में मन को एकाग्र कर दृष्टि को निर्निमेष स्थिर रखने का अभ्यास करने पर योगी के चित्त में उसी स्थिति में स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति हो जाती है। सर्वत्र स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति होने से, सर्वत्र चिदाकाश की स्फूर्ति होने से वह योगी अपनी ज्ञानदृष्टि से समस्त भुवनों की जानकारी रखता है। “भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्”, “चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्” (३।२६-२७) इन दो पातंजल योगसूत्रों में इसी स्थिति का वर्णन है। नेत्रतन्त्र के “नोर्ध्वं ध्यानं प्रयुञ्जीत” (८।४१-४४) इत्यादि श्लोकों में इस तरह की धारणाओं का निषेध है। क्षेमराज ने इन श्लोकों की व्याख्या करते हुए विज्ञानभैरव के अनेक श्लोकों को उद्धृत करते समय इस भावना को भी इसलिये निषिद्ध माना है कि इसमें आणवी धारणा वर्णित है। इस दोष के परिहार के लिये शिवोपाध्याय ने इस श्लोक की दूसरी व्याख्या इस तरह से की है—सूर्य प्रभृति में ¹संयम का अभ्यास करते समय स्वात्मस्वरूप चिदाकाश में एकाकारता की, अभेद की, प्रतीति ही स्वात्मस्वरूप का प्रकाश है। यह स्वात्मस्वरूप ही सब से अधिक अभिलषणीय वस्तु है। अतः इ स धारणा का मुख्य फल यही है, चतुर्दश भुवन, ताराव्यूह आदि का ज्ञान तो गौण फल है ॥७५॥ [ धारणा-५३ ] ²करङ्किण्या क्रोधनया भैरव्या लेलिहानया । खेचर्या दृष्टिकाले च परावा¹प्तिः प्रकाशते ॥७६॥ करङ्किण्या विगतचेष्टं करङ्कमात्रं शवमिव विश्वं पश्यन्त्या, क्रोधनया क्रोधव्यग्रया, भैरव्या दृक्शक्त्या, लेलिहानया भोक्तुमेवाग्रया, खेचर्या दूरमाकाशदर्शनार्थं प्रसृतया मुद्रया उपलक्षिते परावाप्तिः प्रकाशते परादेवीप्रकाशनं श्रीव्योमेशीवामेश्वरीत्यादिशब्दवाच्याया निष्कलादेव्याः सात्म्यं भवति । पाञ्चभौतिकं शरीरं परमाकाशे या विश्रामयति सा कर- ङ्किणीति ज्ञानसिद्धानां मुद्रा, चतुर्विंशतितत्त्वकं मान्त्रे वपुषि या क्रोडीकरोति सा क्रोध- नीति मन्त्रसिद्धानां मुद्रा, स्वस्मिन् या सर्वं संहरते सा भैरवीति मेलापसिद्धानां मुद्रा १. व्याप्तिः-ख०, म० । १. “त्रयमेकत्र संयमः” (३।४) इस योगसूत्र के अनुसार किसी एक विषय पर धारणा, ध्यान और समाधि को केन्द्रित कर देने में संयम शब्द का प्रयोग किया जाता है। २. इस श्लोक से लेकर ८१ संख्या तक के श्लोक महार्थ० परि० (पृ० ८९-९०) में एक साथ उद्धृत हैं।

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