विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ८७ पूर्णत्वेन या सर्वं पुनः पुनरास्वदते सा लेलिहानेति शाक्तसिद्धानां मुद्रा, शक्तिव्यापि- न्यादिषु खेषु सदा चरति या सा खेचरीति शाम्भवसिद्धानां मुद्रा ॥७६॥ महार्थमंजरी प्रभृति ¹क्रमदर्शन के ग्रन्थों में करंकिणी, क्रोधना, भैरवी, लेलिहाना और खेचरी नाम की पांच मुद्राएं प्रसिद्ध हैं । सारे जगत् को संज्ञाशून्य करंक (कंकाल=अस्थिपंजर) के समान देखने वाली मुद्रा करंकिणी कहलाती है । क्रोध से भरी मुद्रा क्रोधना, दृक् शक्ति भैरवी, सबको चाट जाने में लगी लेलिहाना और दूर आकाश तक फैली मुद्रा खेचरी कही जाती है । ये मुद्राएं जब अपने अपने काम में लग जाती हैं, तो उनमें परा देवी का प्रकाश आलोकित हो उठता है । इस स्थिति में जो साधक इन मुद्राओं की अपने में भावना करता है, उसका व्योमेशी, वामेश्वरी आदि नामों से बोधित होने वाली निष्कला देवी से सात्म्य (अभेद) स्थापित हो जाता है । करंकिणी मुद्रा पांचभौतिक शरीर को परम आकाश में विलीन कर देती है, इसके साधक ज्ञानसिद्ध कहलाते हैं । क्रोधनी मुद्रा पृथिवी से लेकर प्रकृति पर्यन्त चौबीस तत्त्वों को मन्त्रमय शरीर में इकट्ठा कर देती है, इसके साधक मन्त्रसिद्ध कहलाते हैं । भैरवी मुद्रा अपने स्वरूप में सारे जगत् को विलीन कर लेती है, इसके साधक मेलापसिद्ध कहलाते हैं । लेलिहाना मुद्रा सारे जगत् का अपने पूर्ण विमर्शमय स्वरूप में बार बार आस्वादन करती रहती है, इसके साधक शाक्तसिद्ध कहलाते हैं । खेचरी मुद्रा शक्ति, व्यापिनी आदि स्थानों में सदा विचरण करने वाली है, इसके साधक शांभवसिद्ध कहलाते हैं । करंकिणी आदि की दूसरी व्याख्या इस प्रकार है—करंक देह को कहते हैं, . इस देह के कारण जिसकी प्रतीति होती है, वह करंकिणी कहलाती है । मूलाधार से पैदा होने वाली मुद्रा क्रोधनी, समस्त जागतिक स्वरूपों का संहार कर देने वाली भैरवी, वासनात्मक पुर्यष्टक का नाश करने वाली लेलिहाना और आवरक द्रव्य के अभाव में ज्ञानरूपी गगन में अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित रहने वाली मुद्रा ²खेचरी के नाम से प्रसिद्ध है ।
- काश्मीर का शैव (प्रत्यभिज्ञा) दर्शन त्रिक दर्शन कहलाता है। त्रिक शब्द की अनेक व्याख्याएं मिलती हैं, किन्तु इसमें कुल, क्रम और प्रत्यभिज्ञा इन तीनों अद्वैतवादी दर्शनों के तत्त्वों की समष्टि होने से इसको यह नाम दिया गया है। क्रम दर्शन को काली नय भी कहते हैं। इसमें शाक्त उपाय का सहारा लिया जाता है। तन्त्रालोक के चतुर्थ आह्निक में और महार्थमंजरी प्रभृति ग्रन्थों में क्रम दर्शन का अच्छा विश्लेषण मिलता है। स्वर्गीय डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय ने और विशेष कर उनके प्रिय शिष्य डॉ० नवजीवन रस्तोगी ने क्रम दर्शन पर सराहनीय कार्य किया है।
- शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत निम्न श्लोक में खेचरी मुद्रा की फलश्रुति बताई गई है— "इयं सा परमा मुद्रा ह्यापातालाच्छिवावधि । तर्पयित्वा जगत्सर्वं निजसंस्थानतः स्थिता ॥" अर्थात् यह खेचरी मुद्रा सर्वोत्तम मानी गई है । पाताल लोक से लेकर शिवलोक (अना- श्रित भुवन) पर्यन्त २२४ भुवनों वाले इस सारे जगत् को आप्यायित करती हुई भी यह सदा अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित रहती है ।