विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ८९ है। इसके ये स्वरूप शांभव, शाक्त, मेलाप, मन्त्र और ज्ञान के नाम से जाने जाते हैं। ये स्वरूप वामेशी, खेचरी, भूचरी, संहारिणी और रौद्री शक्ति से अधिष्ठित होकर ६४ योगि- नियों के रूप में परिणत हो जाते हैं। ये ६४ योगिनियां अपने विभिन्न स्वरूपों का परित्याग कर एकीकार दशा में रौद्रेश्वरी के स्थान में निवास करती हैं, तब सभी प्राणियों का मंगल करने वाला यह ६५वां स्वरूप महाराज्ञी मंगला भगवती के नाम से प्रसिद्ध होता है। यही स्वरूप जब परावस्था में पहुँच जाता है, तो साधक में सामरस्य भाव की उत्पत्ति होती है। जैसे कि अकार आदि वर्ण स्वर कहलाते हैं। ये सोलह होते हैं। इनको ज्ञानसिद्ध कहा जाता है। ककार से लेकर मकार पर्यन्त पचीस व्यंजन मन्त्रसिद्ध हैं। स्वर और व्यंजनों से मिली हुई बारह मात्राएँ अथवा प्रणव की कलाएँ मेलापसिद्ध हैं। यकार से लेकर हकार पर्यन्त आठ व्यंजन शाक्तसिद्ध और आदि वर्ण अकार की अम्बिका, वामा, ज्येष्ठा और रौद्री ये चार कलाएँ शांभवसिद्ध कहलाती हैं। इन्हीं के कारण अकार चतुष्कल भट्टारक कहलाता है। अकार की चार कलाओं का वर्णन संकेतपद्धति में इस प्रकार से है— आदौ यस्य शिरो रौद्री वक्त्रं वामा प्रकीर्तिता। अम्बिका बाहुरित्युक्ता ज्येष्ठा चैवायुधे स्थिता ॥ यह आदि वर्ण अकार ऊपर वर्णित चौसठ रूपों में ज्ञान, मन्त्र, मेलाप, शाक्त और शांभव सिद्ध नाम से अभिहित होने वाले पदार्थों के भीतर वाचक रूप में विद्यमान रहता है। क्रम- दर्शन में यह प्रक्रिया वृन्दचक्र के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रक्रिया का वर्णन महेश्वरानन्द ने— धाममुद्रावर्णकलासंवित्भावस्वभावतः । पातानिकेतदृष्टचा च वृन्दचक्रं प्रकाशितम् ॥ (पृ० ८९) इस श्लोक में संक्षेप में किया है और आगे कुछ विस्तार से धाम, मुद्रा, वर्ण, कला, संवित्, भाव, पात और अनिकेत के भेद से वृन्दचक्र को विस्तार से समझाया है। वृन्दचक्र का दार्शनिक स्वरूप शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत श्लोक में संक्षेप में वर्णित है— ज्ञानं खकौलार्णवर्मिरूपं स्वबोधविश्रान्तिविमर्शमन्त्रः । मेलापसिद्धं स्वविमर्शशून्यं शाक्तं महासंहृति शाम्भवं खम् ॥ इस श्लोक में निहित भाव की व्याख्या ऊपर की जा चुकी है। इस ¹वृन्दचक्र की भावना करने से साधक की परावस्था प्रकाशित हो जाती है। महार्थमंजरीपरिमल (पृ० ८९) में इसी प्रसंग में विज्ञानभैरव का यह श्लोक उद्धृत है। वहीं (पृ० ९०) महेश्वरानन्द ने यह भी बताया है कि इन पाँच मुद्राओं को साधने की विधि विज्ञानभैरव में ही आगे के पाँच श्लोकों में बताई गई है ॥७६॥
- शिवोपाध्याय इस श्लोक की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करने के बाद लिखते हैं कि वृन्दचक्र का निर्णय भट्टारक कृत प्राकृतत्रिशिका के विवरण में अनेक प्रकार से किया गया है। इस विषय का विस्तार वहीं देखना चाहिये (पृ० ६९)। खेद का विषय है कि यह ग्रन्थ आज मिलता नहीं।