भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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९० : विज्ञानभैरव [ धारणा-५४ ] मृद्वासन स्फिक्जैकेन हस्तपादौ१ निराश्रयम्२ । निधाय३ तत्प्रसङ्गेन परा पूर्णा मतिर्भवेत् ॥७७॥ निराश्रयं यथा भवति तथा हस्तौ पादौ च निधाय कृत्वा मृद्वासने कोमले चैलाद्यासने एकेन स्फिजा कटिप्रोथेन स्थितस्य तत्प्रसङ्गेन धारणाया अस्या अभ्यासेन तादृगासनप्रकृष्टतरस्थित्या परा पूर्णा मतिर्भवेत् सर्वाङ्गेषु प्रत्यंशं साकल्येन चेतयन्ती विगलिततमोरजस्का सात्त्विकी मतिर्भवेत् ॥७७॥ ऊँचे-नीचे अथवा कड़े आसन पर बैठने पर भावना में चंचलता आ सकती है, अतः वस्त्र, ऊन, मृगचर्म आदि के कोमल आसन पर साधक को बैठना चाहिये। उस कोमल आसन पर गावतकिये के सहारे वह साधक इस तरह से बैठे कि उसका आधा शरीर ही उस आसन पर टिका रहे। बाकी शरीर को वह ढीला छोड़ दे। इस स्थिति का अभ्यास करते रहने से शरीर को बड़ा आराम मिलता है। इसी सुखमय स्थिति में चित्त को स्थिर कर देने पर योगी के सारे शरीर में तमोगुण और रजोगुण से निर्लिप्त शुद्ध सात्त्विक बुद्धि का प्रकाश फैल जाता है, अर्थात् कोमल आसन पर आराम से बैठने से कुछ क्षण के लिये परम विश्राम की अनुभूति होती है, उस विश्रान्ति दशा में चित्त को लगा देने पर वह बढ़ती जाती है और अन्त में योगी का कण-कण उसी आनन्द से आप्लावित हो उठता है ॥७७॥ [ धारणा-५५ ] उपविश्यासने सम्यग् बाहू कृत्वाऽर्ध४कुञ्चितौ । कक्षव्योम्नि मनः ५कुर्वन् शममायाति ६तल्लयात् ॥७८॥ आसने सम्यगुपविश्य बाहू अर्धकुञ्चितौ सामिकुञ्चितौ, 'अवकुञ्चितौ' इति पाठे संकुचितौ, कृत्वा कक्षव्योम्नि उभयकक्षाकाशे मनः कुर्वन् चित्तस्यैकाग्रतां निष्पादयन्, 'निराकुर्वन्' इति पाठे संकुचितौ बाहू कक्षव्योम्नि स्थापयन्, तल्लयात् मनसोऽस्यां मुद्रायां साधितायां लीनत्वाद्धेतोः शममायाति शान्तस्वात्मस्वरूपमभि- व्यज्यते ॥७८॥ आसन पर ठीक तरह से बैठकर अपने बाजुओं को थोड़ा तिरछा करके समेट कर उनको अपनी कांख के पास सुविधापूर्वक आराम से टिका दे। इस स्थिति में भी कुछ क्षणों के लिये परम विश्रान्ति का अनुभव होता है। कक्षि (कांख) गत आकाश में उत्पन्न इस विश्रान्ति दशा में चित्त की एकाग्रता को बढ़ाने से यह मुद्रा सिद्ध हो जाती है और मन उसी स्थिति में लीन हो जाता है। उसके शान्त हो जाने से साधक का शान्त स्वात्मस्वरूप अभि- व्यक्त हो जाता है। नाना विकल्पों की लहरियों के उठते रहने से मन जब अशान्त रहता है, १. °पादं-म०। २. °ये-ख०। ३. वि°-ख०, म०। ४. °व°-ख०। ५. निरा°-ख०। ६. चिं°-म०।