विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ९१ तो उसके कारण स्वात्मस्वरूप का बोध नहीं हो पाता। किन्तु मन जब शान्त हो जाता है, तो अब तक छिपा हुआ उसका स्वात्मबोध प्रकट हो जाता है ॥७८॥ [ धारणा-५६ ] स्थूलरूपस्य भावस्य स्तब्धां दृष्टिं निपात्य च । अचिरेण निराधारं मनः कृत्वा शिवं व्रजेत् ॥७९॥ स्थूलरूपस्य घटदेहादेर्भावस्य उपरि स्तब्धां निरुन्मेषानिमेषां दृष्टिं निपात्य, चशब्दादन्तर्लक्ष्यां च कृत्वा अचिरेण सत्वरं मनो निराधारं परिहृतविकल्पं यथा भवति तथा विधाय किञ्चिदप्यचिन्तयन् शिवं परमात्मैक्यं व्रजेत् प्राप्नुयात् ॥७९॥ स्थूल रूप वाले घट, पट, देह आदि भावों पर उन्मेष-निमेष से रहित अत एव स्तब्ध (एक टक) दृष्टि डाले और उसको अन्तर्मुख बनाने का अभ्यास करे। इस मुद्रा का बार-बार अभ्यास करते रहने से मन बाह्य आलम्बनों से छुटकारा पा जाता है, वह शीघ्र ही सभी प्रकार के विकल्पों से शून्य हो जाता है। इस तरह से साधक का चित्त जब सभी बाह्य विषयों की चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है, तो उसको शिवभाव ही प्राप्ति हो जाती है, सभी पदार्थों के साथ उसकी परम एकता स्थापित हो जाती है ॥७९॥ [ धारणा-५७ ] मध्यजिह्वे स्फारितास्ये मध्ये निक्षिप्य चेतनाम् । होच्चारं मनसा कुर्वंस्ततः शान्ते प्रलीयते ॥८०॥ मध्येऽन्तराले एव जिह्वा यस्य, ईदृशे विस्फारिते च आस्ये सति, तन्मध्ये विस्फारितमुखमध्ये चेतनां बुद्धिं निक्षिप्य होच्चारम् अनच्छहकारमात्रोच्चारं मनसैव कुर्वन् ततः शान्ते स्वात्मस्वरूपे प्रलीयते विलीनो भवति। शान्तात्मा प्रकाशत इत्यर्थः ॥८०॥ अपने मुँह को फैलाकर जिह्वा को उलट कर ऊपर तालु प्रदेश में ले जाने से खेचरी मुद्रा बनती है। इस मुद्रा में अपनी बुद्धि को स्थिर करके केवल मन से अनच्छ (स्वर रहित) हकार का उच्चारण करने से साधक शान्त अवस्था में लीन हो जाता है। अर्थात् उसका शान्त स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है। 1प्राण की उच्छ्वास दशा में स्वाभाविक रूप से ‘हं’ का तथा निश्वास दशा में ‘सः’ का उच्चारण होता है— सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत् पुनः। (श्लो० १५३) अर्थात् यह प्राण सकार के साथ बाहर निकलता है और हकार के साथ पुनः प्रविष्ट होता है। इस वचन के अनुसार प्राण की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया में ‘हं सः सो हं’ इस अजपा
- पृ० २९-३० की टिप्पणी द्रष्टव्य।