विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९२ : विज्ञानभैरव गायत्री का स्वाभाविक रूप से दिन-रात अनवरत जप चलता रहता है । किन्तु खेचरी मुद्रा की साधना में जिह्वा के तालु प्रदेश में ही रहने से सकार का बहिर्गमन नहीं होने पाता, अर्थात् सकार का उच्चारण नहीं होने पाता । अतः उस अवस्था में केवल स्वर रहित हकार का ही उच्चारण होता है । इसीलिये श्लोक में अनच्क हकार के उच्चारण की बात कही गई है । इस खेचरी मुद्रा की साधना में भ्रूमध्य में अपनी दृष्टि को स्थिर रखना पड़ता है । जैसा कि विवेकमार्तण्ड में बताया गया है— कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा । भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ॥ अर्थात् जब जिह्वा को उलट कर तालुप्रदेश में विद्यमान कपालकुहर में प्रविष्ट करा दिया जाता है और दृष्टि को भ्रूमध्य में स्थिर कर दिया जाता है, तो यह खेचरी मुद्रा कहलाती है । गीता के निम्न श्लोक में भी लगभग यही स्थिति वर्णित है— स्पर्शान् कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । 1प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ (५।२७) अर्थात् बाह्य विषयों को मन से बाहर निकाल दे और नेत्रों को भ्रूमध्य में स्थिर कर दे । साथ ही नासिका के भीतर चलने वाले प्राण और अपान की गति को योगी समान कर दे । इस तरह से गीता के इस श्लोक में अजपा स्थिति की ओर इङ्गित किया गया है, क्योंकि उसी प्रक्रिया के अभ्यास से प्राण और अपान की गति में समता, अन्ततः एकता स्थापित होती है ॥८०॥ [ धारणा - ५८ ] आसने शयने स्थित्वा निराधारं वि१भावयन्२ । ३स्वदेहं४ मनसि क्षीणे क्षणात्५ क्षीणाशयो भवेत् ॥८१॥ अजिन-कौशेय-चक्रालात-तूलपटी-मखमल्ल-शीतलपट्टमयोपधानास्तरणशय्यो- त्तरच्छदसंवलनसमकालमेव आनन्दमयदशोद्भूतौ मनसि चित्ते क्षीणे लीने सति १. ॰चिन्तयेत्-म० । २. ॰येत्-ख० । ३. स्वं देहं-म० । ४. ॰हे-ख० । ५. ॰द् भूता॰-ख० ।
- भगवद्गीता की अनेक व्याख्याएं प्रकाशित हो चुकी हैं, किन्तु श्रीधरी टीका के संक्षिप्त विवेचन को छोड़कर प्राण और अपान के संबन्ध में कहीं भी कुछ नहीं लिखा गया है । श्रीधरी में बताया गया है कि उच्छ्वास और निःश्वास के रूप में नासिका से निरन्तर प्रवहमान प्राण और अपान की ऊपर और नीचे की ओर की गति को कुम्भक प्राणायाम के अभ्यास से समान कर दिया जाता है । अथवा प्राण को बाहर आने नहीं दिया जाता और अपान को भीतर नहीं प्रविष्ट होने दिया जाता, किन्तु नासिका के छिद्र तक ही सीमित कर दिया जाता है । इस तरह से भी उच्छ्वास और निःश्वास की गति को समान कर लिया जाता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)